10 / 05 / 17 की मुरली से चार्ट MARKS:- 100

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 3*5=15)

➢➢ *सच्चा सच्चा आशिक बनकर रहे ?*

➢➢ *"बुधी इधर उधर न भटके" - इस पर अटेंशन दिया ?*

➢➢ *"प्राप्ति को सामने रखते हुए निरंतर बाप को याद किया ?*.

∫∫ 2 ∫∫ विशेष अभ्यास (Marks:2*10=20)

➢➢ *श्रेष्ठ संस्कारों के आधार पर भविष्य संसार बनाने का पुरुषार्थ कर धारणा स्वरुप बनकर रहे ?*

➢➢ *दृढ़ता की शक्ति से कड़े संस्कारों को भी मोम की तरह पिघलाया ?*.

∫∫ 3 ∫∫ विशेष पुरुषार्थ (Marks: 15)
( इस रविवार की अव्यक्त मुरली से... )

➢➢ *"अपने विष्णु स्वरुप का अनुभव किया ?"*.

∫∫ 4 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)

( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

➢➢  *"मीठे बच्चे - तुम सच्चे सच्चे आशिक बन मुझ माशूक को याद करो तो तुम्हारी आयु बढ़ जायेगी, योग और पढ़ाई से ही तुम ऊँच पद पा सकेंगे"*

❉   *प्यारे बाबा :-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... सच्चे प्यार की मुस्कराती मदमाती यादो में रग रग को डुबो दो... सच्चे माशूक के साथ अपनी प्रीत जोड़कर... *प्यार के अहसासो में डूब जाओ और प्राप्तियों के अनन्त खजाने अपने दामन में सजाओ*... योग और पढ़ाई की जादूगरी से सहज ही विश्व का अधिकार पाओ..."

➳ _ ➳  *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मै आत्मा सच्चे प्यार को पाने वाली... *ईश्वर माशूक संग हर पल मुस्कराने वाली सच्ची आशिक हूँ.*.. कभी मनुष्यो में प्यार की बून्द खोजने वाली... आज प्यार के सागर को ही पाकर... अपने महान भाग्य पर धन्य धन्य हो उठी हूँ... कितना प्यारा मेरा भाग्य है.."

❉   *मीठे बाबा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... ईश्वरीय यादो में अनन्त खजाने सहज ही पाकर... सबसे महान भाग्य से भर चलो... *ईश्वर पिता के सारे खजानो को प्यार में सहज ही लूट चलो*... प्यार के तार जोड़कर विश्व की अमीरी को बाहों में भर लो... आशिक बनकर सच्चे माशूक को अपनी यादो का दीवाना बना दो..."

➳ _ ➳  *मैं आत्मा :-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मैं आत्मा भगवान को ही माशूक रूप में पाकर सच्चे प्यार का सुख हर पल हर साँस ले रही हूँ... *भगवान मुझे यूँ मिल जायेगा यूँ प्यार करेगा, और प्यार से भर जाएगा* यह तो कल्पना में भी न था...प्यारे बाबा किन शब्दों में आपका शुक्रिया करूँ..."

❉   *प्यारे बाबा :-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... अपने सत्य स्वरूप में डूबकर, सच्चे पिता की मीठी महकती यादो में रोम रोम से भीग जाओ... इन सच्ची यादो में ही सच्चे सुखो के भण्डार समाये है... यह यादे ही सच्चे प्यार का पर्याय है.. सारे सुख इन यादो में निहित है... *इन यादो और ज्ञान रत्नों से जीवन को अनन्त ऊंचाइयों पर ले चलो*..."

➳ _ ➳  *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपके प्रेम में खोयी हुई अतीन्द्रिय सुख में डूबी हुई हूँ... *मीठे बाबा आपको पाकर मेने सब कुछ पा लिया है.*.. सच्चे प्रेम को दामन में सजा लिया है... और इसकी मीठी अनुभूतियों में हर पल खोयी खोयी सी हूँ..."

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∫∫ 5 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)
( आज की मुरली की धारणा पर आधारित... )

✺   *"ड्रिल :- आज की मुरली से बाबा की 4 निमनलिखित शिक्षाओं की धारणा के लिए विशेष योग अभ्यास*"
          ❶   *सच्चा सच्चा आशिक बनना*
          ❷   *बुद्धियोग एक माशूक से लगाना*
          ❸   *निरन्तर याद करना*
          ❹   *पवित्र जरूर बनना*

➳ _ ➳  मन बुद्धि को सभी बाहरी बातों से डिटैच कर मैं रिलेक्स हो कर बैठ जाती हूँ और अपना संपूर्ण ध्यान मस्तक में भृकुटि सिहांसन पर एकाग्र करती हूँ। बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं स्पष्ट देख रही हूँ अपने दिव्य स्वरूप को। *मुझे स्पष्ट अनुभव हो रहा है कि यह देह अलग है और इस देह में विराजमान मैं चैतन्य सत्ता आत्मा अलग हूँ*। अति तेजस्वी पूर्ण प्रकाशित स्वरूप है मुझ आत्मा का। एकाग्र हो कर मैं अपने इस स्वरूप को देख रही हूँ। *मुझ से निकल रही अनन्त शक्तियां चारों ओर फ़ैल रही हैं और वायुमण्डल को शुद्ध बना रही हैं*। मंत्रमुग्ध हो कर मैं अपने इस स्वरूप को देख रही हूँ और अपनी शक्तिशाली किरणे चारों ओर प्रवाहित कर रही हूँ।

➳ _ ➳  इसी दिव्य अनुभूति के साथ अब मैं आत्मा रूपी पार्वती अपने मन बुद्धि को परमधाम में रहने वाले अपने शिव प्रीतम पर एकाग्र करती हूँ। *बुद्धि रूपी दिव्य नेत्रों द्वारा मैं स्पष्ट देख रही हूँ परमधाम में अखण्ड ज्योति के रूप में विराजमान अपने ज्ञान सूर्य शिव साजन को*। उनसे आ रही दिव्य किरणों का प्रवाह परमधाम से सीधा मुझ आत्मा पर पड़ रहा हैऔर एक दिव्य आलौकिक आनन्द की अनुभूति करवा रहा है। मेरे शिव प्रीतम से आ रही पवित्र तरंगों का प्रवाह मुझे अपनी और खींच रहा है। *उनके प्रेम में मग्न मैं आत्मा पार्वती इस देह को छोड़ अब उनकी ओर बढ़ रही हूँ*। सेकण्ड में साकारी दुनिया को पार कर मैं पहुँच जाती हूँ उनके पास अपने स्वीट साइलेन्स होम में और जा कर अपने शिव प्रीतम के साथ कम्बाइंड हो जाती हूँ। उनके निस्वार्थ प्यार में मैं खो जाती हूँ । अपने असीम प्यार से, अपनी सर्वशक्तियों से वो मुझे पूरी तरह से भरपूर कर देते हैं।

➳ _ ➳  उनके निस्वार्थ, निर्मल और निश्छल प्यार से भरपूर हो कर मैं लौट आती हूँ फिर से साकारी दुनिया, साकारी देह में अपना पार्ट बजाने के लिए । *किन्तु अब यह साकारी दुनिया और इस दुनिया का कोई भी आकर्षण मुझे अपनी और आकर्षित नही कर रहा* । अब मैं जान चुकी हूँ कि यह नश्वर देह और इस देह से जुड़े सारे सम्बन्ध केवल स्वार्थ की नींव पर टिके हैं । इस असार संसार में कोई सार है ही नही । केवल मेरे शिव साजन का प्यार ही निस्वार्थ है । मेरे सर्व सम्बन्ध केवल उनके साथ हैं ।

➳ _ ➳  अपने शिव प्रीतम के अविनाशी प्यार की मीठी यादों में खोई हुई मैं स्वयं से ये प्रोमिस करती हूँ कि जैसे शमा पर परवाना पूरी तरह फ़िदा हो जाता है। *माशूक के लिए आशिक अपनी जान की बाजी लगा देता है ऐसे ही मैं आत्मा भी सच्चा आशिक बन अपने शिव माशूक पर सम्पूर्ण रीति बलिहार जाऊंगी*। अपनी बुद्धि का योग केवल उनके संग ही जोड़ कर रखूंगी। देह और देह की इस दुनिया में रहते हुए भी मैं ना तो इस देह से और ना ही इस देह से जुड़े सम्बन्धों में ममत्व रखूंगी। इनके बीच रहते इनसे तोड़ निभाते हुए मैं अपने मन बुद्धि की तार को सदा अपने शिव प्रीतम के साथ जोड़ कर रखूंगी ।

➳ _ ➳  अपने अविनाशी माशूक की निरन्तर याद में रहने के लिए अब मैं अपने दिल की प्रीत केवल उनके ही साथ रखूंगी। उनके लव में सदा लीन रहने वाली लवलीन आत्मा बन हर कर्म करते उन्हें साथी बना कर उनके साथ का अनुभव सदा करती रहूँगी। एक क्षण के लिए भी अब मैं उन्हें कभी भूलूंगी नही। *देह अभिमान में आने के कारण मुझ आत्मा से जो विकर्म हुए हैं उन्हें योग अग्नि से भस्म कर पावन बनने का पुरुषार्थ मैं अवश्य करुँगी*। पवित्रता की जो प्रतिज्ञा मैंने अपने शिव साजन से की है उस प्रतिज्ञा को मैं अवश्य पूरा करुँगी। मनसा, वाचा, कर्मणा सम्पूर्ण पवित्र बन सम्पूर्णता को पाना ही अब मेरा लक्ष्य है।

➳ _ ➳  *मन ही मन इस लक्ष्य को पाने की स्वयं से दृढ प्रतिज्ञा कर अपने शिव माशूक की प्यार भरी सुख देने वाले मीठी यादो में मैं आत्मा आशिक बन फिर से खो जाती हूं और अशरीरी बन पहुँच जाती हूँ* अपने प्रीतम के पास और उनके प्रेम की किरणों रूपी बाहों में मैं फिर से समा जाती हूँ।

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∫∫ 6 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:-10)
( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

✺   *"ड्रिल :- मैं आत्मा धारणा स्वरूप हूँ ।"*

➳ _ ➳  आज मैं आत्मा अपने को याद दिला रही हूँ वो पल जब स्वयं भगवान ने मुझे इस भीड़ भरी दुनिया में से ढूँढा... वो पहला दिन याद कर रही हूँ जब मैंने स्वयं की पहचान से मेरे बाबा को पहचाना... *देह और देह के सम्बन्धों को भूल, मैं निराकार ज्योति बिन्दु आत्मा शिवबाबा की संतान हूँ...* मैं आत्मा देह से न्यारी हूँ... मैं शुद्ध पवित्र शक्ति हूँ... मैं आत्मा ज्योति बिंदु स्वरूप हूँ... एक चमकता हुआ दिव्य सितारा हूँ...

➳ _ ➳  मैं परम पवित्र आत्मा हूँ... पवित्रता मुझ आत्मा का निजी गुण है... मेरे संस्कार भी अति पवित्र है... *पवित्रता ही मेरा स्वधर्म है... अभी के श्रेष्ठ व शुद्ध संस्कारों से ही मैं आत्मा भविष्य संसार बनाने वाली धारणा स्वरूप आत्मा हूँ*... मेरे पिता परमात्मा में पवित्रता का अखूट ख़ज़ाना है... मैं आत्मा इस ख़ज़ाने की अधिकारी हूँ... मुझे अब स्मृति आयी है, जब मैं आत्मा शिवबाबा के पास परमधाम में थी तब मैं सम्पूर्ण पवित्र थी... जब मैं आत्मा इस सृष्टि में अवतरित हुई तब भी मैं सम्पूर्ण पवित्र स्वरूप में आयी थी...

➳ _ ➳  मैंने देव आत्मा के रूप में इस धरा पे जन्म लिया... *एक धर्म, एक राज्य के संस्कार ही मुझ आत्मा के निजी संस्कार है*... मेरा किसी से भी लगाव नही था... मैं आत्मा अति पवित्र थी... परंतु धीरे-धीरे देह के प्रति लगाव भरा, मेरी पवित्रता की शक्ति कम हो गयी... अब मुझ आत्मा को फिर से पवित्र बनाने के लिए भगवान आए है... मैंने अब भगवान से प्रतिज्ञा की है कि मैं पवित्र अवश्य बनूँगी... मैं आत्मा स्वयं में पवित्रता का अनुभव कर रही हूँ...

➳ _ ➳  जैसे ही मैं आत्मा अपने पवित्र स्वरूप में टिकती हूँ, मुझ आत्मा के जो भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आते है वह मन-वचन-कर्म पवित्रता का अनुभव कर रहे हैं... मैं आत्मा स्वराज्य के धर्म व धारणा पर चल रही हूँ... *संकल्प व स्वप्न मात्र में भी अपवित्रता व दूसरा कोई धर्म नही है*... क्योंकि मैंने भगवान को अपना साथी बनाया है... इस यज्ञ को पावन बनाने का बेड़ा उठाया है...

➳ _ ➳  मैं आत्मा पवित्रता की शक्ति से प्रकृति को भी शुद्ध कर रही हूँ... मैं पवित्रता का अवतार हूँ... *यह धारणा स्वरूप पूरे जगत को अंधकार से रोशनी की तरफ़ लिए जा रहा है*... इससे सबको पवित्र बनने का मार्ग मिल रहा है... और अपवित्रता, दुःख, अशांति, व्यर्थ, विकल्प का नामनिशान ही नहीं है... पवित्रता की कितनी महानता है... यह धारणा पूरे संसार के लिए है... इसी से अब भविष्य संसार बन रहा है...

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∫∫ 7 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks-10)
( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

✺   *"ड्रिल :- दृढ़ता की शक्ति से कड़े संस्कारों को समाप्त करने का अनुभव"*

➳ _ ➳  मैं  आत्मा बाबा के सामने बैठ अपना चार्ट चेक कर रही हूँ... बाबा को अपने कड़े संस्कारों का लेखा-जोखा दे रही हूँ... बाबा मुझे कह रहे है बच्चे किसी भी विकार का अंश भी न रहे... बहुत सूक्ष्म चेकिंग कर चेंज करना हैं... बाबा मुझे बहुत स्नेह भरी दृष्टी दे रहे है... बाबा की दृष्टी में शक्ति भरी हुई है... *बाबा की दृष्टी में विशेष आज दृढ़ता की शक्ति मुझ में समाती जा रही हैं...*

➳ _ ➳  अंगद समान अचल-अडोल स्थिति में स्थित हो... मैं अपने कड़े से कड़े संस्कारों को चुनौती देती हूँ... हर कड़े संस्कार का हिम्मत के साथ सामना कर... दृढ़ता की शक्ति द्वारा खाक करती हूँ... *मैं अपने संस्कारों को एक-एक कर मोम की तरह पिघलते हुए देख रही हूँ...*  शिव बाबा की छत्रछाया में बैठी... उनकी किरणों के निचे निरन्तर रहते... अपने पुराने संस्कारों को परिवर्तित कर नए दिव्य संस्कार भर रही हूँ...

➳ _ ➳  दृढ़ता की शक्ति ने मुझे महान आत्मा बना दिया है... ऊंच ते ऊंच कार्य करने के समर्थ बना दिया हैं... *मैं दृढ़ता शक्ति द्वारा अपने कठोर से कठोर संस्कारो को परिवर्तित कर... मायाजीत विजय रत्न आत्मा बन गई हूँ...* मैं स्वराज्य अधिकारी आत्मा... विश्व परिवर्तन के महान कार्य करने की निमित्त आत्मा हूँ...

➳ _ ➳  दृढ़ता की शक्ति से मेरी दिनचर्या एक्यूरेट बाबा की श्रीमत अनुसार चलती हैं... दृढ़ता की शक्ति द्वारा मैं ब्राह्मण जीवन की हर मर्यादा पूरी शिद्दत से फॉलो करती हूँ... *दृढ़ता की शक्ति ही मेरी पहचान हैं... दृढ़ता की शक्ति ही महान कर्म का आधार हैं...* दृढ़ता की शक्ति से ही मैं आत्मा इस विश्व की ऊंच ते ऊंच आत्मा बन... अन्य आत्माओं की प्रेर्णस्त्रोत बन गई हूँ...

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∫∫ 8 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)
( इस रविवार की अव्यक्त मुरली पर आधारित... )

✺ अव्यक्त बापदादा :-

➳ _ ➳   माया की छाया से बचने के लिए छत्रछाया के अन्दर रहो:- सदा अपने ऊपर बाप के याद की छत्रछाया अनुभव करते हो? याद की छत्रछाया है। इस छत्रछाया को कभी छोड़ तो नहीं देते?  *जो सदा छत्रछाया के अन्दर रहते हैं वे सर्व प्रकार के माया के विघ्नों से सेफ रहते हैं। किसी भी प्रकार से माया की छाया पड़ नहीं सकती। यह 5 विकार, दुश्मन के बजाए दास बनकर सेवाधारी बन जाते हैं। जैसे विष्णु के चित्र में देखा है - कि सांप की शय्या और सांप ही छत्रछाया बन गये। यह है विजयी की निशानी।* तो यह किसका चित्र है? आप सबका चित्र है ना। जिसके ऊपर विजय होती है वह दुश्मन से सेवाधारी बन जाते हैं। ऐसे विजयी रत्न हो। शक्तियाँ भी गृहस्थी माताओं से, शक्ति सेना की शक्ति बन गई। शक्तियों के चित्र में रावण के वंश के दैत्यों को पांव के नीचे दिखाते हैं। शक्तियों ने असुरों को अपने शक्ति रूपी पाँव से दबा दिया। शक्ति किसी भी विकारी संस्कार को ऊपर आने ही नहीं देगी।

✺   *"ड्रिल :-  अपने विष्णु स्वरुप का अनुभव करना"*

➳ _ ➳  मैं आत्मा बगीचे में झूला झूलती हुई आसमान को निहार रही हूँ... 16 कलाओं से परिपूर्ण पूर्णमासी का चाँद चारों ओर अपनी चांदनी बिखेर रहा है... आसमान में सितारे जगमग चमकते हुए अति सुंदर नजर आ रहे हैं... *सितारों की सुन्दरता को देखते हुए मैं आत्मा एकाएक चिंतन करने लगती हूँ कि मैं आत्मा भी एक सितारे मिसल हूँ...* आसमान के सितारों से भी ज्यादा चमक है मुझ आत्मा में...

➳ _ ➳  मैं आत्मा अपने भव्य स्वरूप को देखने लगती हूँ... *जैसे ही आत्मानुभूति करने लगती हूँ प्यारे बाबा की याद आ जाती है...* प्यारे बाबा का आह्वान करती हूँ... प्यारे बाबा को बुलाते ही चंद्रमा में बाबा मुस्कुराते हुए नज़र आने लगते हैं... परमधाम जैसा नज़ारा अनुभव हो रहा है... बाबा के चारों ओर आत्मा सितारे जगमगा रहे हैं... पूरा आसमान छत्रछाया लग रहा है...

➳ _ ➳  बाबा अपनी शीतल किरणों की वर्षा कर रहे हैं... पूरे आसमान से दिव्य किरणों की बौछारें मुझ पर पड़ रही हैं... मुझ आत्मा से एक-एक विकार बाहर निकलते जा रहे हैं... काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार सभी विकार बाहर निकलकर माया रावण का पुतला बन सामने खड़े हो जाते हैं... *बाबा से निकलती दिव्य तेजोमय किरणों से रावण का पुतला बीज सहित भस्म हो रहा है...* मेरे सामने विकारों रूपी रावण का वंश सहित अंत हो चुका है...

➳ _ ➳  मैं आत्मा माया की छाया से मुक्त हो चुकी हूँ... और सदा बाबा की छत्र छाया का अनुभव कर रही हूँ... *मैं आत्मा सभी विकारों पर विजय प्राप्त कर विजयी रत्न होने का अनुभव कर रही हूँ...* माया के सभी विघ्नों से सेफ अनुभव कर रही हूँ... अब मैं आत्मा सदा बाबा की छत्रछाया के अन्दर ही रहती हूँ... पांचो विकार अब मुझ आत्मा के अधीन हो गए हैं... सभी कर्मेन्द्रियाँ मेरे वश हो गए हैं...

➳ _ ➳  ऐसा अनुभव हो रहा है जैसे पांचो विकारों रूपी नाग सेवाधारी बन मेरी सेवा कर रहे हैं... मुझ आत्मा को ये झूला शेषशैया अनुभव हो रहा है जिस पर मैं आत्मा विष्णु स्वरुप में लेटी हुई हूँ... क्षीरसागर में लेटी मैं अपने विष्णु स्वरुप में मायाजीत, प्रकृतिजीत, जगतजीत होने का अनुभव कर रही हूँ... *मैं आत्मा अपने विष्णु स्वरुप का अनुभव करती हुई बाबा की याद की गोदी में सो जाती हूँ...*



⊙_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

                                                                         ♔ ॐ शांति ♔

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