06 / 05 / 17 की मुरली से चार्ट TOTAL MARKS:- 100


शिवभगवानुवाच :-
➳ _ ➳  रोज रात को सोने से पहले बापदादा को पोतामेल सच्ची दिल का दे दिया तो धरमराजपुरी में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। 

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 3*5=15)

➢➢ *बाप सामान सर्व गुणों में फुल बनने का पुरुषार्थ किया ?*

➢➢ *चलते फिरते बाप को याद करने का अभ्यास किया ?*

➢➢ *याद में रह सारे विश्व को शांति का दान दिया ?*
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∫∫ 2 ∫∫ विशेष अभ्यास (Marks:2*10=20)

➢➢ *संगमयुग पर सदा प्रतक्ष्य व ताज़ा फल खा शक्तिशाली व तंदरुस्त अनुभव किया ?*

➢➢ *बाकी सबसे गुण ग्रहण करते हुए फॉलो एक ब्रह्मा बाप को ही किया ?*
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∫∫ 3 ∫∫ विशेष पुरुषार्थ (Marks: 15)
( इस रविवार की अव्यक्त मुरली से... )

➢➢ *सदा सुख की शैय्या पर सोये हुए अनुभव किया ?*
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∫∫ 4 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)
( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

➢➢  *"मीठे बच्चे - शरीर निर्वाह अर्थ कर्म भले करो लेकिन कम से कम 8 घण्टा बाप को याद कर सारे विश्व को शांति का दान दो आप समान बनाने की सेवा करो"*

   *प्यारे बाबा :-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... इस दुनिया में रहते, कर्म करते दिल से सदा ईश्वर पिता को याद करो... *यह यादे ही सर्व सुखो की प्राप्ति का सच्चा आधार है.*.. जितना जितना यादो में दिल से खोये रहोगे... सुख और शांति की किरणे स्वतः ही चहुँ ओर बिखरती रहेंगी... और ऐसा ही आप समान ईश्वरीय दीवाना सबको बनाओ..."

_   *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपकी यादो में खो कर सच्चे प्रेम के स्त्रोत में बह चली हूँ... *सारे नाते आपसे जोड़कर हर रिश्ते का सच्चा सुख पा चली हूँ..*. यादो की गहराई में डूबकर प्रेम सुख शांति से पूरे विश्व को भर कर आप समान बना रही हूँ..."

   *मीठे बाबा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... ईश्वर पिता की यादो में दिल की गहराइयो से डूब जाओ... और खुद गहरे आनन्द की अनुभूतियों को प्राप्त कर... पूरे विश्व को भी इन तरंगो से लबालब कर चलो... *शांति की लहरो से विश्व धरा को शीतल कर चलो.*.. आप समान बनाकर, हर दिल को सच्चे सुखो का अनुभव कराओ..."

_   *मैं आत्मा :-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मैं आत्मा हर पल आपकी यादो में खोकर, अपने भाग्य को आलिशान बना रही हूँ... सच्चे प्रेम में भीगी पावन प्रेम तरंगे... विश्व पर बरसाने वाली प्रेम बदली बन चली हूँ... और *सबको इस सच्चे प्रेम के अहसासो में भिगो कर आप समान रही हूँ.*.."

   *प्यारे बाबा :-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे...  *इन प्यारी सी यादो में अथाह सुख छिपा है.*.. सब कुछ इन यादो में ही समाया है... इसलिए हर कर्म करते, मन के भीतरी तार् ईश्वर पिता से जोड़कर... सच्चे प्रेम को जी लो... और शांति से ओतप्रोत प्रेम लहरियों को पूरे विश्व पर फेला दो... आप समान मीठा, प्यारा और ईश्वरीय दिलवाला बनाने की सेवा कर चलो..."

_   *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा सबको ईश्वरीय खजानो से भरपूर कर आप समान भाग्यशाली महा धनवान् बनाती जा रही हूँ... मीठे बाबा आपकी यादो की खुमारी में रोम रोम से डूबी हुई हूँ... और *सारे विश्व को शांति के प्रकम्पन्न से भर रही हूँ.*.."

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∫∫ 5 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)
( आज की मुरली की धारणा पर आधारित... )

   *"ड्रिल :- आज की मुरली से बाबा की 4 निमनलिखित शिक्षाओं की धारणा के लिए विशेष योग अभ्यास*"
             *बाप समान बनना*
             *किसी को दुःख नही देना*
             *याद का अभ्यास करना*
             *शांति का दान देना*

_   जैसे ही मैं अशरीरी स्थिति में स्थित होती हूँ मेरा सत्य स्वरूप मेरे सामने स्पष्ट दिखाई देने लगता है। मन बुद्धि रूपी नेत्रों से मैं देख रही हूँ कि मैं एक अति सूक्ष्म चमकता हुआ चैतन्य ज्योति बिंदु सितारा हूँ। *इस शरीर रूपी मंदिर में मैं आत्मा रूपी चैतन्य दीपक विराजमान हूँ। मुझ आत्मा रूपी चैतन्य दीपक से दिव्यता का प्रकाश चारों ओर फ़ैल रहा है*। सचमुच मैं कितनी खुशनसीब हूँ जो अपने सत्य स्वरूप को बुद्धि रूपी नेत्रों से स्पष्ट देख रही हूँ। अपने सत्य स्वरूप की स्मृति में टिक कर मैं जैसे ही अपने पिता परमात्मा को याद करती हूँ और मन बुद्धि का कनेक्शन परमधाम निवासी अपने शिव पिता के साथ जोड़ती हूँ *ऐसा अनुभव होता है जैसे बाबा मुझे अपनी ओर खींच रहे हैं*।

_   अपने शिव पिता परमात्मा के प्रेम की डोर से बन्ध कर मैं इस साकारी देह से निकल कर ऊपर की ओर उड़ी चली जा रही हूँ। *इस पांच तत्वों की दुनिया को पार करके मैं जैसे ही सूक्ष्म लोक पहुँचती हूँ मैं देखती हूँ कि फ़रिश्तों का एक विशाल समूह बापदादा के पीछे पीछे जा रहा हैं*। मैं भी अपना लाइट का फरिश्ता स्वरूप धारण कर सभी फरिश्तों के साथ बापदादा के पीछे चल पड़ता हूं। बाबा सभी फ़रिश्तों को ले कर अपनी अवतरण भूमि मधुबन में पहुँचते हैं और शांति स्तम्भ पर आ कर बैठ जाते हैं। *बापदादा से आ रहे शक्तिशाली प्रकम्पन पूरे शांति स्तम्भ में फ़ैल रहें हैं*। पूरा शांति स्तम्भ फ़रिश्तों की लाइट माइट से जगमगा रहा है।

_   एकाएक ऐसा अनुभव होता है जैसे पूरे शांति स्तम्भ में एक विशाल दीपमाला जग उठी है। सभी के फरिश्ता आकारी स्वरूप जैसे लुप्त हो गए हैं और पूरा शांति स्तम्भ जगमग करती मणियों से चमक रहा है। *चारों ओर जगमग करते चैतन्य दीपक दिखाई दे रहें हैं और उन चैतन्य दीपको के सामने विराजमान हैं सबके प्यारे दीपराज परमपिता परमात्मा*। एक महाज्योति जिनसे अनन्त प्रकाश की धाराएं निकल निकल कर चंहु ओर फ़ैल रही हैं। कितना मनमोहक और लुभावना दृश्य है यह। पूरा वायुमण्डल एक अलौकिक दिव्यता से भर गया है। *दीपराज शिव बाबा से आ रही अनन्त शक्तियों की किरणें पा कर सभी चैतन्य दीपकों की रोशनी कई गुणा बढ़ गई है*।

_   दीपराज शिव बाबा अब अपने चैतन्य दीपको को संबोधित करते हुए कहते हैं - "आज दीपराज बाप अपने चैतन्य दीपको से मिलने आये हैं"। *हे मेरी आँखों के तारे, मेरे नयनो के नूर मेरे कुलदीपक बच्चो - "आप ही बाप को प्रत्यक्ष करने वाले हो" इसलिये आपको बाप समान सर्व गुणों में सम्पन्न बनना है*। आपस में बहुत प्यार से रहना है। कभी किसी को दुःख देने का ख्याल भी आपके मन में नही आना चाहिए क्योंकि आप दुःख हर्ता सुख कर्ता बाप के बच्चे हो इसलिये बाप समान सबके दुखों को हरकर उन्हें सुख देना आपका कर्तव्य है।

_   बाप समान बनने के लिए जरूरी है बाप के गुणों को अपने अंदर धारण करना और बाप के गुण तभी धारण होंगे जब निरन्तर बाप को याद करेंगे। *जितना चलते - फिरते हर कर्म करते बाप को याद करने का अभ्यास करेंगे उतना विकर्मों से बचे रहेंगे और याद में रह सारे विश्व को शांति का दान देने के निमित्त बन जायेंगे*। क्योकि बाप की याद आपको स्व स्थिति में स्थित कर देगी और स्व स्थिति में स्थित हो कर जो भी कर्म करेंगे तो आपसे निकलने वाले वायब्रेशन स्वतः ही दूसरों की सेवा करते रहेंगे।

_   सभी चैतन्य दीपक अपने फ़रिश्ता स्वरूप में स्थित हो कर बाबा की मीठी मीठी समझानी को बड़े ध्यान से और बड़े प्रेम से सुन रहें हैं। *अब दीपराज शिव बाबा ब्रह्मा बाबा के आकारी तन में विराजमान हो कर सभी चैतन्य दीपको को मीठी दृष्टि देते हुए सभी से विदाई ले कर चल पड़ते हैं वपिस अपने लोक* और सभी चैतन्य दीपक विश्व सेवा के कार्य को संपन्न करने के लिए फिर से लौट आते हैं अपने अपने साकारी तन में।

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∫∫ 6 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:-10)
( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

   *"ड्रिल :- "मै आत्मा शक्तिशाली वा तंदुरुस्त  हूँ।*

 _   मैं आत्मा... इस कलियुगी दुनिया में दर दर भगवान को ढूंढ रही थी... हर मंदिर... मस्जिद...  हर गुरुद्वारा... माथा टेका... विनती की मिलने के लिए... उपवास व्रत सब कुछ किया... मन्नतें मांगी...आ जाओ भगवान... आ जाओ... लेकिन भगवान तो जैसे रुठ के बैठ गए थे... इस बात से मैं आत्मा बेखबर थी कि *स्वयं भगवान ने अपने कल्प से बिछुड़े बच्चे को ढूंढ रहे है*... स्वयं ढ़ूंढ़कर अपने गले लगाया...

 _   मुझ आत्मा का हाथ... जब स्वयं बापदादा ने थामा तब लगा कि मेरी भक्ति यथार्थ... परिपूर्ण... सफल हो गईं है... मुझे भगवान ने ढूंढा... अपना बनाया... *अपनी असली पहचान दी कि "मैं कौन हूँ ?" भगवान मेरा क्या लगता है ?* मैं आत्मा पदमापदम सौभाग्यशाली हूं... मैं आत्मा अपने ख़ुशी के आंसू को रोक नहीं पा रही हूँ...

 _   स्वयं बापदादा ने वरदानी हाथ मुझ आत्मा के सर पर रख वरदानों से... आशीर्वादों से मेरी झोली भर दी... और मुझे लेकर उड़ चलते हैं सूक्ष्म वतन की ओर... और मै आत्मा... *मन ही मन गुनगुनाती चल पड़ती हूँ "जाने क्या देखा मुझ में मुझे प्यार कर लिया... मेरे लाडले कहा ... आँचल में भर लिया..."*

 _   मैं आत्मा... अपने फ़रिश्ता स्वरुप में स्थित... पहुँच गई परमधाम में... अलौकिक शांति ही शांति हैं जहाँ... *आवाज से परे एक ऐसी दुनिया... जहाँ सर्वत्र निर्संकल्प स्थिति है... न दुःख... न हताशा... न देह का भान...* बाबा से आती हुई रंगबिरंगी किरणों के झरनों में नहाती हुई मै आत्मा... अपने हर विकर्म से मुक्त हो रही हूँ...

 _   इस संगमयुग का यथार्थ ज्ञान... युग की एक एक क्षण की कीमत... मुझे मेरे बापदादा समझा रहे हैं... बाबा से आती हुई ज्ञान की किरणें... मुझ आत्मा को परिपूर्ण कर रही है... *संगमयुग... पुरूषार्थी युग...पदमगुणा प्राप्ति का यह युग... जिसका एक एक क्षण अनमोल है... कीमती हैं* यह बात मै आत्मा... अपने फ़रिश्ता स्वरुप मे स्थित एकाग्रचित हो कर महसूस कर रही हूँ...

 _   *इस संगमयुग में... कदमो में पदमो की कमाई जमा करने वाली मैं आत्मा... बापदादा की लाडली बन गई हूँ...* मैं आत्मा अपनी सारी कमी कमजोरियों को बापदादा के हवाले कर... उनकी सारी शक्तियों को धारण कर इस स्थूल शरीर में प्रवेश कर रही हूँ... सर्व उर्जारूपी शक्तियों के खजानों से मेरा स्थूल शरीर शक्तिशाली और तंदुरुस्त हो गया है...

  _   मैं आत्मा... *इस संगमयुग पर बापदादा की बनकर... बापदादा को प्रत्यक्ष निहारते हुए अपने संगमयुग के अंतिम जीवन को पूरी तरह से बापदादा को समर्पित करते हुए...* औरों को भी इस संगमयुग का यथार्थ ज्ञान बांट रही हूँ... और मन ही मन बापदादा को शुक्रिया बाबा शुक्रिया कहती हूँ... ॐ शांति...

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∫∫ 7 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks-10)
( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

   *"ड्रिल :- फालो फादर करते गुणग्राही बनने का अनुभव"*

_   सफेद लाइट का सूक्ष्म शरीर धारण कर... एक नन्हा सा बालक बन... मैं अपने शिव पिता को पुकारती हूँ... बाबा मेरे मीठे बाबा... मेरे पास आ जाओ... मेरी पुकार सुनकर... मेरे शिव पिता सेकंड में ब्रह्मा बाबा के आकारी रथ का आधार लेकर... मेरे सामने उपस्थित हो जाते हैं... बाबा को देख मैं अपनी छोटी-छोटी बाहें... ऊपर की ओर करती हूँ... *बाबा झट मुझे अपनी गोद में उठा कर... मेरा माथा चुम लेते हैं*...

_ बाबा बड़े प्यार मेरे सिर पर अपना हाथ फेरते हैं... और अपनी गोद में मुझे ले... कर ऊपर की ओर चल पड़ते हैं... ऐसा लग रहा है जैसे... *अपने शिव पिता के साथ मैं पूरे विश्व का भ्रमण कर रही हूँ*... बाबा एक बहुत सुंदर झूले पर... मुझे अपने पास बिठा कर झूला झूलते हुए... मीठी-मीठी रूहरिहान करने लगते हैं...

_ बाबा मुझ से पूछते है... मेरे लाडले बच्चे आप मुझ से कितना प्यार करते हो... मैं अपनी नन्ही नन्ही छोटी सी बाहों को पूरा फैला कर कहती हूँ... बाबा मैं आपसे इतना प्यार करती हूँ... बाबा मेरा जवाब सुनकर... मन्द मन्द मुस्कराने लगते है... मैं बाबा से पूछती हूँ बाबा... अब आप बताओ आप मुझसे कितना प्यार करते हो... *बाबा अपनी बाहें फैलाते है... मैं देखती हूँ कि बाबा की बाहों का दायरा... निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है*...

_   मैं अचंभित होकर बाबा को देख रही हूँ... ओर हैरान होकर बाबा से पूछती हूँ... बाबा आपका प्यार तो मापा ही नही जा सकता... *बाबा हँसतें हुए जवाब देते है हाँ बच्चे...मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूँ*... बाबा के प्यार को देख मैं गद-गद हो जाती हूँ... और बाबा से पूछती हूँ बाबा... आपके इस बेहद प्यार का रिटर्न... मैं कैसे दे सकती हूँ...

_ *बाबा मुस्कुरा कर कहने लगे... बच्चे फॉलो ब्रह्मा बाबा... मैं आत्मा बाबा से कहती हूँ... जी बाबा*... कहकर नीचे चली आती हूँ... ब्रह्मा बाप समान कदम-कदम श्रीमत पर चलती जा रही हूँ... बाप समान विश्व सेवाधारी बन... सेवा करती जा रही हूँ... बाबा के दर्पण में अपने को देखती हूँ... अपनी चैकिंग करती जाती हूँ... क्या मेरे दर्पण में बाप के कर्म दिखाई पड़ते है...

_   ब्रह्मा बाबा को फॉलो करते-करते... मैं आत्मा स्वयं को निश्चिंत और बेफिकर बादशाह अनुभव करती जा रही हूँ... बीती को बीती कर... साक्षी भाव रख आगे बढ़ती जा रही हूँ... ब्रह्मा बाप के समान... मुझ आत्मा के चेहरे से... बोल-चाल...चलन से रॉयल्टी दिखाई दे रही है... *आत्मिक दृष्टि को पक्का कर... सम्पर्क में आने वाली आत्माओं के शरीर को न देख गुणों को देख... उन गुणों को स्वयं में ग्रहण करती जा रही हूँ*... शुक्रिया बाबा शुक्रिया...

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∫∫ 8 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)
( इस रविवार की अव्यक्त मुरली पर आधारित... )

 अव्यक्त बापदादा :- 

 _   सदा सुख की शैय्या पर सोई हुई आत्मा के लिए यह विकार भी छत्रछाया बन जाता हैं -दुश्मन बदल सेवाधारी बन जाते हैं। *अपना चित्र देखा है ना! तो ‘शेष शय्यानहीं लेकिन ‘सुख-शय्या'। सदा सुखी और शान्त की निशानी है - सदा हर्षित रहना। सुलझी हुई आत्मा का स्वरूप सदा हर्षित रहेगा। उलझी हुई आत्मा कभी हर्षित नहीं देखेंगे। उसका सदा खोया हुआ चेहरा दिखाई देगा* और वह सब कुछ पाया हुआ चेहरा दिखाई देगा। जब कोई चीज खो जाती है तो उलझन की निशानी क्योंक्याकैसे ही होता है। तो रूहानी स्थिति में भी जो भी पवित्रता को खोता हैउसके अन्दर क्योंक्या और कैसे की उलझन होती है। तो समझा कैसे चेक करना हैसुख-शांति के प्राप्ति स्वरूप के आधार पर मंसा पवित्रता को चेक करो।

   *"ड्रिल :-  सदा सुख की शैय्या पर सोये हुए अनुभव करना*

 _   *मैं आत्मा रात को चार्ट देकर बाबा की गोदी में सोई हुई हूँ... बाबा मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए लोरी गाकर मुझे सुला रहे हैं...* मैं आत्मा अतीन्द्रिय सुख की निद्रा में सो जाती हूँ... मैं आत्मा स्वप्न देखती हूँ कि मैं परिस्तान में हूँ और परिस्तान की शहजादी हूँ... 16 कलाओं से सम्पन्न हूँ... स्वर्ग सुखों को भोग रही हूँ... 

 _   मीठे, लाडले बच्चे जागो... अमृत पीने की वेला हो गई... मीठे बाबा की मीठी आवाज़ सुन मैं जाग जाती हूँ... और प्यारे बाबा को गुड मॉर्निंग कहकर उनकी गोदी में बैठकर रूह-रूहान करती हूँ... प्यारे बाबा- कितना सुन्दर स्वप्न था... मैं परियों की शहजादी हूँ... *प्यारे बाबा बोले-हाँ बच्चे- तुम हो ही मेरी लाडली शहजादी... मैं आया ही हूँ तुम्हें स्वर्ग की महारानी बनाने...* फिर बाबा मुझे प्यार से अपनी गोदी में उठाकर ले चलते हैं परमधाम...

 _   परमधाम में मैं आत्मा अपने बाबा की गोदी में समाकर उनसे एक हो जाती हूँ... मैं आत्मा सर्व गुणों, शक्तियों से सम्पन्न बन रही हूँ... अखूट खजानों की मालिक बन रही हूँ... *पवित्रता के सागर में डुबकी लगाकर मैं आत्मा सम्पूर्ण पवित्र बन रही हूँ...* पवित्रता की शक्ति से मुझ आत्मा के जन्म-जन्मान्तर के विकर्म दग्ध हो रहे हैं...

 _   *पवित्रता की शक्ति को धारण करने से मुझ आत्मा के अन्दर क्योंक्या और कैसे की उलझन समाप्त हो रही है...* मैं आत्मा सदा सुख-शांति की अनुभूति कर रही हूँ... सर्व प्राप्तियों से सम्पन्न अवस्था का अनुभव कर रही हूँ... मैं आत्मा सबकुछ पाकर सदा हर्षित रहती हूँ... अब मैं आत्मा उलझन की शय्या से निकल सदा सुख की शय्या पर रहती हूँ...

 _   सदा सुख की शय्या पर रहने से मुझ आत्मा के विकार भी छत्रछाया बन गए हैं... दुश्मन भी बदलकर सेवाधारी बन गए हैं... जिस परमात्मा को जन्म-जन्म से ढूंढ रही थी उसने मुझे ढूंढकर अपना बना लिया... सर्व अधिकार देकर सर्व खजानों से सम्पन्न बना दिया... मेरे प्यारे बाबा मुझे उलझन और काँटों की शय्या से निकाल अपनी गोदी की सुख की शय्या पर सुलाते हैं... *प्यारे बाबा मुझ आत्मा को 21 जन्मों का वर्सा देकर 21 जन्म तक सदा सुख की शय्या का वरदान देते हैं...* 

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

ॐ शांति
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