"मीठे बच्चे - अब अशरीरी
होकर घर जाना है इसलिए जब किसी से बात करते हो तो आत्मा भाई-भाई समझ बात करो,
देही-अभिमानी रहने की मेहनत करो''
प्रश्नः- भविष्य राज तिलक प्राप्त करने का आधार
क्या है?
उत्तर:- पढ़ाई। हरेक को पढ़कर राज तिलक लेना है।
बाप की है पढ़ाने की ड्युटी, इसमें आशीर्वाद की बात
नहीं। पूरा निश्चय है तो श्रीमत पर चलते चलो। ग़फलत नहीं करनी है। अगर मतभेद में
आकर पढ़ाई छोड़ी तो नापास हो जायेंगे, इसलिए बाबा कहते -
मीठे बच्चे, अपने ऊपर रहम करो। आशीर्वाद मांगनी नहीं है,
पढ़ाई पर ध्यान देना है।
ओम् शान्ति। सुप्रीम टीचर बच्चों को पढ़ाते
हैं। बच्चे जानते हैं परमपिता परमात्मा, पिता भी है,
टीचर भी है। ऐसा तुमको पढ़ाते हैं जो और कोई पढ़ा न सके। तुम कहते
हो शिवबाबा हमको पढ़ाते हैं। अब यह बाबा कोई एक का नहीं है। मन्मनाभव, मध्याजीभव, इसका अर्थ समझाते हैं मुझे याद करो।
बच्चे तो अब समझदार हुए हैं।
बेहद का बाप कहते हैं तुम्हारा वर्सा तो है ही - यह
कभी भूलना नहीं चाहिए। बाप आत्माओं से ही बातें करते हैं। अभी तुम जीव आत्मायें हो
ना। बेहद का बाप भी निराकार है। तुम जानते हो इस तन द्वारा वह हमको पढ़ा रहे हैं
और कोई ऐसे नहीं समझेंगे। स्कूल में टीचर पढ़ाते हैं तो कहेंगे लौकिक टीचर,
लौकिक बच्चों को पढ़ाते हैं। यह है पारलौकिक सुप्रीम टीचर जो
पारलौकिक बच्चों को पढ़ाते हैं। तुम भी परलोक, मूलवतन के
निवासी हो। बाप भी परलोक में रहते हैं। बाप कहते हैं हम भी शान्तिधाम के निवासी
हैं और तुम भी वहाँ के ही निवासी हो। हम दोनों एक धाम के रहवासी हैं। तुम अपने को
आत्मा समझो। मै परम आत्मा हूँ। अभी तुम यहाँ पार्ट बजा रहे हो। पार्ट बजाते-बजाते
तुम अभी पतित बन गये हो। यह सारा बेहद का माण्डवा है, जिसमें
खेल होता है। यह सारी सृष्टि कर्मक्षेत्र है, इसमें खेल हो
रहा है। यह भी सिर्फ तुम ही जानते हो कि यह बेहद का खेल है, इसमें
दिन और रात भी होते हैं। सूर्य और चांद कितनी बेहद की रोशनी देते हैं, यह है बेहद की बात। अभी तुमको ज्ञान भी है। रचता ही आकर रचता और रचना के
आदि-मध्य-अन्त का परिचय देते हैं। बाप कहते हैं तुमको रचना के आदि-मध्य-अन्त का
राज़ सुनाने आया हूँ। यह पाठशाला है, पढ़ाने वाला अभोक्ता
है। ऐसे कोई नहीं कहेंगे कि हम अभोक्ता हैं। अहमदाबाद में एक साधू ऐसे कहता था,
परन्तु बाद में ठगी पकड़ी गई। इस समय ठगी भी बहुत निकल पड़ी है।
वेषधारी बहुत हैं। इनको तो कोई वेष है नहीं। मनुष्य समझते हैं कृष्ण ने गीता सुनाई
तो आजकल कितने कृष्ण बन पड़े हैं। अब इतने कृष्ण तो होते नहीं। यहाँ तो तुमको
शिवबाबा आकर पढ़ाते हैं, आत्माओं को सुनाते हैं।
तुमको बार-बार कहा गया है कि अपने को आत्मा
समझ भाई-भाई को सुनाओ। बुद्धि में रहे - बाबा की नॉलेज हम भाइयों को सुनाते हैं।
मेल अथवा फीमेल दोनों भाई-भाई हैं इसलिए बाप कहते हैं तुम सब मेरे वर्से के हकदार
हो। वैसे फीमेल को वर्सा नहीं मिलता है क्योंकि उनको ससुरघर जाना है। यहाँ तो हैं
ही सब आत्मायें। अशरीरी होकर जाना है घर। अभी जो तुमको ज्ञान रत्न मिलते हैं यह
अविनाशी रत्न बन जाते हैं। आत्मा ही ज्ञान का सागर बनती है ना। आत्मा ही सब कुछ
करती है। परन्तु मनुष्यों को देह-अभिमान होने के कारण, देही-अभिमानी बनते नहीं हैं। अब तुमको देही-अभिमानी बन एक बाप को याद करना
है। कुछ तो मेहनत चाहिए ना। लौकिक गुरु को कितना याद करते हैं। मूर्ति रख देते
हैं। अब कहाँ शिव का चित्र, कहाँ मनुष्य का चित्र। रात-दिन
का फ़र्क है। वह गुरु का फोटो पहन लेते हैं। पति लोगों को अच्छा नहीं लगता कि
दूसरों का फोटो पहनें। हाँ, शिव का पहनेंगे तो वह सबको अच्छा
लगेगा क्योंकि वह तो परमपिता है ना। उनका चित्र तो होना चाहिए। यह है गले का हार
बनाने वाला। तुम रुद्र माला का मोती बनेंगे। यूँ तो सारी दुनिया रुद्र माला भी है,
प्रजापिता ब्रह्मा की माला भी है, ऊपर में
सिजरा है। वह है हद का सिजरा, यह है बेहद का। जो भी
मनुष्य-मात्र हैं, सबकी माला है। आत्मा कितनी छोटे से छोटी
बिन्दी है। बिल्कुल छोटी बिन्दी है। ऐसे-ऐसे बिन्दी देते जाओ तो अनगिनत हो जायेगी।
गिनती करते-करते थक जायेंगे। परन्तु देखो, आत्मा का झाड़
कितना छोटा है। ब्रह्म तत्व में बहुत थोड़ी जगह में रहती है। वह फिर यहाँ आती है
पार्ट बजाने। तो यहाँ फिर कितनी लम्बी-चौड़ी दुनिया है। कहाँ-कहाँ एरोप्लेन में
जाते हैं। वहाँ फिर एरोप्लेन आदि की दरकार नहीं। आत्माओं का छोटा-सा झाड़ है। यहाँ
मनुष्यों का कितना बड़ा झाड़ है।
यह सब हैं प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान।
जिसको कोई एडम, कोई आदि देव कहते हैं। मेल-फीमेल तो जरूर
हैं। तुम्हारा है प्रवृत्ति मार्ग। निवृति मार्ग का खेल होता नहीं। एक हाथ से क्या
होगा। दोनों पहिये चाहिए। दो हैं तो आपस में रेस करते हैं। दूसरा पहिया साथ नहीं
देता है तो ढीले पड़ जाते हैं। परन्तु एक के कारण ठहर नहीं जाना चाहिए। पहले-पहले
पवित्र प्रवृत्ति मार्ग था। फिर होता है अपवित्र। गिरते ही जाते हैं। तुम्हारी
बुद्धि में सारा ज्ञान है। यह झाड़ कैसे बढ़ता है, कैसे
एडीशन होती जाती है। ऐसा झाड़ कोई निकाल न सके। कोई की बुद्धि में रचता और रचना के
आदि-मध्य-अन्त का नॉलेज है ही नहीं इसलिए बाबा ने कहा था - यह लिखो कि हमने रचता
द्वारा रचता और रचना की नॉलेज का अन्त पाया है। वह तो न रचता को जानते, न रचना को। अगर परम्परा यह ज्ञान चला आता तो कोई बतावे ना। सिवाए तुम
ब्रह्माकुमार-कुमारियों के कोई बता न सके। तुम जानते हो हम ब्राह्मणों को ही
परमपिता परमात्मा पढ़ाते हैं। हम ब्राह्मणों का ही ऊंचे से ऊंचा धर्म है। चित्र भी
जरूर दिखाना पड़ता है। चित्र बिगर कब बुद्धि में बैठेगा नहीं। चित्र बहुत
बड़े-बड़े होने चाहिए। वैरायटी धर्मों का झाड़ कैसे बढ़ता है, यह भी समझाया है। आगे तो कहते थे हम आत्मा सो परमात्मा, परमात्मा सो हम आत्मा। अब बाप ने इसका भी अर्थ बताया है। इस समय हम सो
ब्राह्मण हैं फिर हम सो देवता बनेंगे, नई दुनिया में। अभी हम
पुरूषोत्तम संगमयुग पर हैं अर्थात् यह है पुरूषोत्तम बनने का संगमयुग। यह सब तुम समझा
सकते हो - रचता और रचना का अर्थ, हम सो का अर्थ। ओम् अर्थात्
मैं आत्मा फर्स्ट, फिर यह शरीर है। आत्मा अविनाशी और यह शरीर
विनाशी है। हम यह शरीर धारण कर पार्ट बजाते हैं। इसको कहा जाता है आत्म अभिमानी।
हम आत्मा फलाना पार्ट बजाती हैं, हम आत्मा यह करती हैं,
हम आत्मा परमात्मा के बच्चे हैं। कितना वण्डरफुल ज्ञान है। यह ज्ञान
बाप में ही है, इसलिए बाप को ही बुलाते हैं।
बाप है ज्ञान का सागर। उनकी भेंट में फिर
हैं अज्ञान के सागर, आधा कल्प है ज्ञान, आधा कल्प है अज्ञान। ज्ञान का किसको पता ही नहीं है। ज्ञान कहा जाता है रचता
द्वारा रचना को जानना। तो जरूर रचता में ही ज्ञान है ना, इसलिए
उनको क्रियेटर कहा जाता है। मनुष्य समझते हैं क्रियेटर ने यह रचना रची है। बाप
समझाते हैं यह तो अनादि बना-बनाया खेल है। कहते हैं पतित-पावन आओ, तो रचता कैसे कहेंगे? रचता तब कहें जब प्रलय हो फिर रचे।
बाप तो पतित दुनिया को पावन बनाते हैं। तो यह सारे विश्व का जो झाड़ है उनके
आदि-मध्य-अन्त को तो मीठे-मीठे बच्चे ही जानते हैं। जैसे माली हरेक बीज को और झाड़
को जानते हैं ना। बीज को देखने से सारा झाड़ बुद्धि में आ जाता है। तो यह है
ह्युमेनिटी का (मनुष्य सृष्टि का) बीज। उन्हें कोई नहीं जानते। गाते भी हैं
परमपिता परमात्मा सृष्टि का बीजरूप है। सत, चित, आनन्द स्वरूप है, सुख, शान्ति,
पवित्रता का सागर है। तुम जानते हो यह सारा ज्ञान परमपिता परमात्मा
इस शरीर द्वारा दे रहे हैं। तो जरूर यहाँ आयेंगे ना। पतितों को पावन प्रेरणा से
कैसे बनायेंगे। तो बाप यहाँ आकर सबको पावन बनाकर ले जाते हैं। वह बाप ही तुमको पाठ
पढ़ा रहे हैं। यह है पुरूषोत्तम संगमयुग। इस पर तुम भाषण कर सकते हो कि कैसे पुरूष
तमोप्रधान से श्रेष्ठ सतोप्रधान बनते हैं। तुम्हारे पास टॉपिक तो बहुत हैं। यह
पतित तमोप्रधान दुनिया सतोप्रधान कैसे बनती है - यह भी समझने लायक है। आगे चलकर
तुम्हारा यह ज्ञान सुनेंगे। भल छोड़ भी देंगे फिर आयेंगे क्योंकि गति-सद्गति की
हट्टी एक ही है। तुम कह सकते हो कि सर्व का सद्गति दाता एक बाप ही है। उनको श्री
श्री कहते हैं। श्रेष्ठ से श्रेष्ठ है परमपिता परमात्मा। वो हमें श्रेष्ठ बनाते
हैं। श्रेष्ठ है सतयुग। भ्रष्ट है कलियुग। कहते भी हैं भ्रष्टाचारी हैं। परन्तु
अपने को नहीं समझते। पतित दुनिया में एक भी श्रेष्ठ नहीं। श्री श्री जब आये तब आकर
श्री बनाये। श्री का टाइटिल सतयुग आदि में देवताओं का था। यहाँ तो सबको श्री श्री
कह देते हैं। वास्तव में श्री अक्षर है ही पवित्रता का। दूसरे धर्म वाले कोई भी
अपने को श्री नहीं कहते। श्री पोप कहेंगे क्या? यहाँ तो सबको
कहते रहते हैं। कहाँ हंस मोती चुगने वाले, कहाँ बगुले गन्द
खाने वाले। फ़र्क तो है ना। यह देवतायें हैं फूल, वह है
गॉर्डन आफ अल्लाह। बाप तुमको फूल बना रहा है। बाकी फूलों में वैरायटी है। सबसे
अच्छा फूल है किंग फ्लावर। इन लक्ष्मी-नारायण को नई दुनिया का किंग क्वीन फ्लावर
कहेंगे।
तुम बच्चों को आन्तरिक खुशी होनी चाहिए।
इसमें बाहर का कुछ करना नहीं होता। यह बत्तियां आदि जलाने का भी अर्थ चाहिए। शिव
जयन्ती पर जलानी चाहिए या दीवाली पर? दीवाली पर
लक्ष्मी का आह्वान करते हैं। उनसे पैसे मांगते हैं। जबकि भण्डारा भरने वाला तो शिव
भोला भण्डारी है। तुम जानते हो शिवबाबा द्वारा हमारा अखुट खजाना भर जाता है। यह
ज्ञान रत्न धन है। वहाँ भी तुम्हारे पास अथाह धन रहता है। नई दुनिया में तुम
मालामाल हो जायेंगे। सतयुग में ढेरों के ढेर हीरे जवाहर थे। फिर वो ही होंगे।
मनुष्य मूँझते हैं। यह सब खत्म होगा, फिर कहाँ से आयेगा?
खानियां खुद गई, पहाड़ियां टूट गई फिर कैसे
होंगी? बोलो, हिस्ट्री रिपीट होती है
ना, जो कुछ था सो फिर रिपीट होगा। तुम बच्चे पुरूषार्थ कर
रहे हो, स्वर्ग का मालिक बनने का। स्वर्ग की
हिस्ट्री-जॉग्राफी फिर रिपीट होगी। गीत में है ना - आपने सारी सृष्टि, सारा समुद्र, सारी पृथ्वी हमको दे दी है जो कोई हमसे
छीन नहीं सकता। उसकी भेंट में अब क्या है! जमीन के लिए, पानी
के लिए, भाषा के लिए लड़ते हैं।
स्वर्ग के रचता बाबा का जन्म मनाया जाता
है। जरूर उसने स्वर्ग की बादशाही दी होगी। अब तुमको बाप पढ़ा रहे हैं। तुमको इस
शरीर के नाम रूप से न्यारा हो अपने को आत्मा समझना है। पवित्र बनना है - या तो
योगबल से या तो सजायें खाकर। फिर पद भी कम हो जाता है। स्टूडेण्ट की बुद्धि में
रहता है ना - हम इतना मर्तबा पाते हैं। टीचर ने इतना पढ़ाया है। फिर टीचर को भी
सौगात देते हैं। यह तो बाप तुमको विश्व का मालिक बनाते हैं। तो तुम फिर भक्ति
मार्ग में उनको याद करते रहते हो। बाकी बाप को आप सौगात क्या देंगे? यहाँ तो जो कुछ देखते हो वह तो रहना नहीं है। यह तो पुरानी छी-छी दुनिया
है तब तो मुझे बुलाते हैं। बाप तुमको पतित से पावन बनाते हैं। इस खेल को याद करना
चाहिए। मेरे में रचना के आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज है, जो
तुमको सुनाता हूँ, तुम अब सुनते हो फिर भूल जाते हो। पांच
हजार वर्ष के बाद फिर चक्र पूरा होगा। तुम्हारा पार्ट कितना लवली है। तुम
सतोप्रधान व लवली बनते हो। फिर तमोप्रधान भी तुम ही बनते हो। तुम ही बुलाते हो
बाबा आओ। अब मैं आया हूँ। अगर निश्चय है तो श्रीमत पर चलना चाहिए। ग़फलत नहीं करनी
चाहिए। कई बच्चे मतभेद में आकर पढ़ाई छोड़ देते हैं। श्रीमत पर नहीं चलेंगे,
पढ़ेंगे नहीं तो नापास भी तुम ही होंगे। बाप तो कहते हैं अपने पर
रहम करो। हरेक को पढ़कर अपने को राज तिलक देना है। बाप को तो है पढ़ाने की ड्युटी,
इसमें आशीर्वाद की बात नहीं। फिर तो सभी पर आशीर्वाद करनी पड़े। यह
कृपा आदि भक्ति मार्ग में मांगते हैं। यहाँ वह बात नहीं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता
बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) प्रवृत्ति में रहते आपस में
रेस करनी है। परन्तु अगर किसी कारण से एक पहिया ढीला पड़ जाता है तो उसके पीछे ठहर
नहीं जाना है। स्वयं को राजतिलक देने के लायक बनाना है।
2) शिव जयन्ती बड़ी धूम-धाम से
मनानी है क्योंकि शिवबाबा जो ज्ञान रत्न देते हैं, उससे ही
तुम नई दुनिया में मालामाल बनेंगे। तुम्हारे सब भण्डारे भरपूर हो जायेंगे।
वरदान:- सर्व
पदार्थो की आसक्तियों से न्यारे अनासक्त, प्रकृतिजीत
भव
अगर कोई भी पदार्थ कर्मेन्द्रियों को
विचलित करता है अर्थात् आसक्ति का भाव उत्पन्न होता है तो भी न्यारे नहीं बन
सकेंगे। इच्छायें ही आसक्तियों का रूप हैं। कई कहते हैं इच्छा नहीं है लेकिन अच्छा
लगता है। तो यह भी सूक्ष्म आसक्ति है - इसकी महीन रूप से चेकिंग करो कि यह पदार्थ
अर्थात् अल्पकाल सुख के साधन आकर्षित तो नहीं करते हैं? यह पदार्थ प्रकृति के साधन हैं, जब इनसे अनासक्त
अर्थात् न्यारे बनेंगे तब प्रकृतिजीत बनेंगे।
स्लोगन:- मेरे-मेरे
के झमेलों को छोड़ बेहद में रहो तब कहेंगे विश्व कल्याणकारी।
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