06-05-18 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 30-07-83 मधुबन
(दीदी मनमोहिनी जी के शरीर
त्याग करने पर बापदादा के महावाक्य)
आज अटल राज्य अधिकारी, अटल, अचल स्थिति में रहने
वाले विजयी बच्चों को देख रहे हैं। अभी से अटल बनने के संस्कारों के आधार पर अटल
राज्य की प्रालब्ध पाने के पहले पुरुषार्थ में कल्प-कल्प अटल बने हो। ड्रामा के हर
दृष्य को ड्रामा चक्र में संगमयुगी टाप प्वाइंट पर स्थित हो कुछ भी देखेंगे तो
स्वत: ही अचल अडोल रहेंगे। टाप प्वाइंट से नीचे आते हैं तब ही हलचल होती है। सभी
ब्राह्मण श्रेष्ठ आत्मायें सदा कहाँ रहते हो? चक्र में संगमयुग ऊंचा युग
है। चित्र के हिसाब से भी संगमयुग का स्थान ऊंचा है और युगों के हिसाब से छोटा सा
युग प्वाइंट ही कहेंगे। तो इसी ऊंची प्वाइंट पर, ऊंचे स्थान पर, ऊंची स्थिति पर, ऊंची नॉलेज में, ऊंचे ते ऊंचे बाप की
याद में, ऊंचे ते ऊंची सेवा स्मृति स्वरूप होंगे तो सदा समर्थ होंगे।
जहाँ समर्थ है वहाँ व्यर्थ सदा के लिए समाप्त है। हरेक ब्राह्मण पुरुषार्थ ही
व्यर्थ को समाप्त करने का कर रहे हो। व्यर्थ का खाता वा व्यर्थ का हिसाब-किताब
समाप्त हुआ ना! वा अभी भी कुछ पुराना व्यर्थ का खाता है? जबकि ब्राह्मण जन्म
लेते प्रतिज्ञा की - तन-मन-धन सब तेरा तो व्यर्थ संकल्प समाप्त हुआ, क्योंकि मन समर्थ
बाप को दिया।
दो-तीन दिनों में मन तेरा के बदले मेरा तो नहीं बना दिया।
ट्रस्टियों को डायरेक्शन है कि मन से सदा समर्थ सोचना है। तो व्यर्थ की मार्जिन है
क्या? व्यर्थ चला? आप कहेंगे कि स्नेह दिखाया।
परिवार के स्नेह के धागे में तो सभी बंधे हुए हो, यह तो बहुत अच्छा। अगर
स्नेह के मोती गिराये तो वह मोती अमूल्य रहे। लेकिन क्यों, क्या के संकल्प से
आंसू गिराये तो वह व्यर्थ के खाते में जमा हुआ। स्नेह के मोती तो आपकी स्नेही दीदी
के गले में माला बन चमक रहे हैं। ऐसे सच्चे स्नेह की मालायें तो दीदी के गले में
बहुत पड़ी हैं। लेकिन एक परसेन्ट भी हलचल की स्थिति में आये, ऑसू बहाये, वह वहाँ दीदी के पास
नहीं पहुँचें, क्यों? वह सदा विजयी, अचल, अडोल आत्मा रही है
और अब भी है तो अचल आत्मा के पास हलचल वाले की याद पहुँच नहीं सकती। वह यहाँ की
यहाँ ही रह जाती है। मोती बन माला में चमकते नहीं हैं। जैसी स्थिति वाले, जैसी पोजीशन वाली
आत्मा वैसी पोजीशन में स्थित रहने वाली आत्माओं की याद आत्मा को पहुँचती है। स्नेह
है, यह तो बहुत अच्छी निशानी है। स्नेह है तो अर्पण भी स्नेह
करो ना! जहाँ सच्चा श्रेष्ठ स्नेह है वहाँ दु:ख की लहर नहीं क्योंकि दु:खधाम से
पार हो गये ना।
मीठे-मीठे उल्हनें भी सब पहुँचे। सभी का उल्हना यही रहा कि
हमारी मीठी दीदी को क्यों बुलाया। तो बापदादा बोले, जो सबको मीठी लगती वही बाप
को मीठी लगेगी ना। अगर आवश्यकता ही मिठास की हो तो और किसकों बुलायें। मीठे ते
मीठे को ही बुलायेंगे ना।
आप लोग ही सोचते हो और बार-बार पूछते हो कि एडवांस पार्टी
की विशेष आत्मायें अब तक गुप्त क्यों? तो प्रत्यक्ष करने चाहते हो
ना। समय प्रमाण कुछ एडवांस पार्टी की आत्मायें श्रेष्ठ आत्माओं का आवाह्न कर रही
हैं। ऐसे आदि परिवर्तन के विशेष कार्य अर्थ आदिकाल वाली आदि रत्न आत्मायें चाहिए।
विशेष योगी आत्मायें चाहिए, जो अपने योगबल का प्रयोग कर सकें। भाग्य विधाता बाप की
भागीदार आत्मायें चाहिए। भाग्य विधाता ब्रह्मा को भी कहा जाता है। समझा क्यों बुलाया
है। यह सोचते हो यहाँ क्या होगा? कैसे होगा? ब्रह्मा बाप अव्यक्त
हुए तो क्या हुआ और कैसे हुआ, देखा ना। दादी को अकेले
समझते हो? वह नहीं समझती है, आप लोग समझते हो। ऐसे है ना? (दादी की ओर ईशारा)
आपकी डिवाइन युनिटी नहीं है, है ना? तो डिवाइन युनिटी की
भुजायें नहीं हैं क्या? डिवाइन युनिटी है ना? किसलिए यह ग्रुप बनाया? सदा एक दो के सहयोगी
बनने के लिए। जब चाहो जिसको चाहो सभी सेवा के लिए जी हाजिर हैं। इन दादियों की आपस
में बहुत अन्दरूनी प्रीति है, आप लोगों को पता नहीं है
इसलिए समझते हो अभी क्या होगा! एक दीदी ने यह साबित कर दिखाया कि हम सभी आदि रत्न
एक है। दिखाया ना? ब्रह्मा बाप के बाद साकार रूप में 9 रत्नों की पूज्य
आत्मायें सेवा की स्टेज पर प्रत्यक्ष हुई तो 9 रत्न वा आठ की माला सदा एक
दो के सहयोगी हैं। कौन हैं आठ की माला? जो ओटे सेवा में वह अर्जुन
अर्थात् अष्ट माला है। तो सेवा की स्टेज पर अष्ट रत्न, 9 रत्न अपना पार्ट
बजा रहे हैं और पार्ट बजाना ही अपना पार्ट वा अपना नम्बर प्रत्यक्ष करना है।
बापदादा ऐसे नम्बर नहीं देंगे लेकिन पार्ट ही प्रत्यक्ष कर रहा है। तो अष्ट रत्न
हैं - आपस में सदा के स्नेही और सदा के सहयोगी, इसलिए सदा आदि से सेवा के
सहयोगी आत्मायें सदा ही सहयोग का पार्ट बजाती रहेंगी। समझा। और क्या क्वेश्चन है? बताया क्यों नहीं, यह क्वेश्चन है? बतलाते तो दीदी के
योगी बन जाते। ड्रामा का विचित्र पार्ट है, विचित्र का चित्र पहले नहीं
खींचा जाता है। हलचल का पेपर अचानक होता है। और अभी भी इस विशेष आत्मा का पार्ट, अभी तक जो आत्मायें
गई हैं उन्हों से न्यारा और प्यारा है। हर एक क्षेत्र में इस श्रेष्ठ आत्मा का साथ, सहयोग की अनुभूति
करते रहेंगे। ब्रह्मा बाप का अपना पार्ट है, उन जैसा पार्ट नहीं हो
सकता। लेकिन इस आत्मा की विशेषता सेवा के उमंग-उत्साह दिलाने में, योगी, सहयोगी और प्रयोगी
बनाने में सदा रही है, इसलिए इस आत्मा का यह विशेष संस्कार समय प्रति समय आप सबको
भी सहयोगी रहने का अनुभव कराता रहेगा। यह भी हर एक आत्मा का अपना-अपना विचित्र
पार्ट है। अच्छा।
मधुबन में आये स्नेह का स्वरूप दिखाया उसके लिए यह भी विश्व
में सेवा के निमित्त पार्ट बजाया। यह आप सबका आना विश्व में स्नेह की लहरें, स्नेह की खुशबू, स्नेह की किरणें
फैलाना है, इसलिए भले पधारे। दीदी की तरफ से भी बापदादा सभी को स्नेह
की, सेवा के स्वरूप की बधाई दे रहे हैं। दीदी भी देख रही है, टी.वी. पर बैठी है।
आप भी वतन में जाओ तब देखो ना। यह भी सर्विस की एक छाप है।
आज के संगठन में कमल बच्ची (दीदी जी की लौकिक भाभी) भी याद
आई, वह भी याद कर रही है और जिन्होंने भी स्नेही श्रेष्ठ आत्मा
के प्रति अपना सहयोग दिया उन अथक बच्चों को चाहे यहाँ बैठे हैं वा नहीं भी बैठे
हैं लेकिन सभी बच्चों ने शुभ भावना, शुभ कामना और एक ही लगन से
जो अपना स्नेह दिखाया वह बहुत ही श्रेष्ठ रहा। इसके लिए विशेष बापदादा को दीदी ने
कहा कि हमारी तरफ से ऐसे स्नेही सेवाधारी परिवार को याद और थैंक्स देना। तो दीदी
का काम आज बापदादा कर रहे हैं। आज बापदादा सन्देशी बन सन्देश दे रहे हैं। जो हुआ
बहुत ही राज़ों से भरा हुआ ड्रामा हुआ। आप सबको दीदी प्रिय हैं और दीदी को सेवा
प्रिय है, इसलिए सेवा ने अपनी तरफ खींच लिया। जो हुआ बहुत ही परिवर्तन
के पर्दे को खोलने के लिए अच्छे ते अच्छा हुआ। न भगवती का (डाकटर का) दोष है, न भगवान का दोष है।
यह तो ड्रामा का राज़ है। इसमे न भगवती कुछ कर सकता, न भगवान। कभी भी उसके प्रति
नहीं सोचना कि इसने ऐसा किया, ऐसा आपरेशन कर लिया, नहीं। उसका स्नेह
लास्ट तक भी माँ का ही रहा, इसलिए उसने अपनी तरफ से कोई कमी नहीं की। यह तो ड्रामा का
खेल है। समझा - इसलिए कोई संकल्प नहीं करना।
आज तो सिर्फ आज्ञाकारी बन दीदी की तरफ से सन्देशी बन आये
हैं। सभी अटल स्थिति में स्थित रहने वाले, अटल राज्य अधिकारी, निश्चय बुद्धि
निश्चिन्त, विजयी बच्चों को आज त्रिमूर्ति याद-प्यार दे रहे हैं, और नमस्ते कर रहे
हैं। अच्छा।
डिवाइन युनिटी यहाँ आ जाए:- (स्टेज पर बापदादा ने सभी
दादियों को बुलाया और माला के रूप में बिठा दिया) माला तो बन गई ना। (दादी जी से)
अभी यह (जानकी दादी) और यह (चन्द्रमणी दादी) आपके विशेष सहयोगी हैं। इस रथ का
(गुल्ज़ार बहन का) तो डबल पार्ट है। बापदादा का पार्ट और यह पार्ट - डबल पार्ट।
सहयोगी तो सभी हैं आपके। इसको (निर्मलशान्ता दादी को) सिर्फ थोड़ा सा जब मौसम
अच्छी हो तब बुलाना। उड़ता पंछी हैं ना सभी? कोई सेवा का बन्धन नहीं।
स्वतंत्र पंछी तो ताली बजायी और उड़े। ऐसे हैं ना। स्वतंत्र पंछी, किसी भी विशेष स्थान
और विशेष सेवा का बन्धन नहीं । विश्व की सेवा का बन्धन, बेहद सेवा का बन्धन, इसलिए स्वतंत्र हो।
जब भी जहाँ आवश्यकता है वहाँ पहले मैं। हरेक आत्मा का अपना-अपना पार्ट है। डिवाइन
युनिटी है पालना वाली और मनोहर पार्टी है सेवा के क्षेत्र में आगे-आगे बढ़ने वाली।
तो अभी सेवा के साथ-साथ पालना की विशेष आवश्यकता है। जैसे दीदी को पालना के हिसाब
से कई आत्मायें माँ के स्वरूप में देखती रहीं, वैसे तो मात-पिता एक है, लेकिन साकार में
निमित्त बन पार्ट बजाने के कारण पालना देने का विशेष पार्ट बजाया। ऐसे ही जो आदि
रत्न हैं, उन्हों को पालना देने का, बाप की पालना लेने का
अधिकारी बनाने की पालना देना है। लेनी बाप की पालना है लेकिन बाप की पालना लेने के
भी पात्र तो बनाना पड़ेगा ना। तो वह पात्र बनाने की सेवा इस आत्मा ने (दीदी जी ने)
बहुत अच्छी नम्बरवन की। तो आप भी सभी नम्बरवन हो ना। सेकण्ड माला में तो नहीं हो
ना। पहली माला में हो ना। तो पहली माला वाले तो सभी नम्बरवन हैं। अच्छा - पाण्डवों
को भी बुलाओ।
बापदादा के सामने सभी मुख्य भाई स्टेज पर आये:- पाण्डव भी
आदि रत्न हो ना। पाण्डव भी माला में हैं, ऐसे नहीं सिर्फ शक्तियाँ
हैं, पाण्डव भी हैं। किस माला में अपने को देखते हो। वह तो हरेक
आप भी जानते हो और बाप भी जानते हैं लेकिन पाण्डव भी इसी विशेष याद माला में हैं।
कौन हैं? कौन समझते हैं अपने को? बिना पाण्डवों के कोई भी
कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। जितनी शक्तियों की शक्ति है वैसे पाण्डवों की भी विशाल
शक्ति है इसलिए चतुर्भुज रूप दिखाया है। कम्बाइन्ड। दोनों ही कम्बाइन्ड रूप से इस
सेवा के कार्य में सफलता पाते हैं। ऐसे नहीं समझना - यही (दादियाँ) अष्ट देव हैं
या यही 9 रत्न हैं। लेकिन पाण्डवों में भी हैं। समझा - इतनी
जिम्मेवारी का ताज सदा पड़ा रहे। सदा ताज पड़ा है ना। सभी एक दो के सहयोगी बनें।
यह सब बाप की भुजायें हैं वा साकार में निमित्त बनी हुई दादी की सहयोगी आत्मायें
हैं। "सदा हम एक हैं" - यही नारा सदा ही सफलता का साधन है। संस्कार
मिलाने की रास करने वाले, सदा ही हर जन्म में श्रेष्ठ आत्माओं के संगठन में रास करते
रहेंगे। यहाँ की रास मिलाना अर्थात् सदा क्या पार्ट बजायेंगे। सदा श्रेष्ठ आत्माओं
के फ्रैन्डस बनेंगे, सम्बन्धी बनेंगे। बहुत नजदीक सम्बन्धी लेकिन सम्बन्धी और
मित्र के दोनों स्वरूप के साथी। मित्र के मित्र भी, सम्बन्धी के सम्बन्धी भी।
तो निमित्त हो। यही दीदी की रूह-रिहान रही। तो सब पाण्डव और शक्तियाँ एक बाप की
श्रीमत के गुलदस्ते में गुलदस्ता बनें। दीदी से विशेष स्नेह है ना आप सबका। अच्छा!
आज तो ऐसे ही मिलन मनाने आये हैं इसलिए अभी छुट्टी लेते
हैं। (दादी जी ने बापदादा के सामने भोग रखा तो बाबा बोले) आज आफीशल मिलने आये हैं
इसलिए कुछ स्वीकार नहीं करेंगे। पहले बच्चे स्वीकार करते हैं फिर बाप। फिर तो सदा
ही मिलते रहेंगे, खाते रहेंगे, खिलाते रहेंगे लेकिन आज
दीदी के सन्देशी बनकर आये हैं, सन्देशी सन्देश देकर चला
जाता है। दीदी ने कहा है दादी से हाथ मिलाकर आना।
(बापदादा ने दादी जी को हाथ
दिया और वतन में उड़ गये।)
वरदान:-
स्वराज्य अधिकारी बन कर्मेन्द्रियों को आर्डर प्रमाण चलाने
वाले अकालतख्त सो दिलतख्तनशीन भव
मैं अकाल तख्तनशीन आत्मा हूँ अर्थात् स्वराज्य अधिकारी राजा
हूँ। जैसे राजा जब तख्त पर बैठता है तो सब कर्मचारी आर्डर प्रमाण चलते हैं। ऐसे
तख्तनशीन बनने से यह कर्मेन्द्रियां स्वत: आर्डर पर चलती हैं। जो अकालतख्त नशीन
रहते हैं उनके लिए बाप का दिलतख्त है ही क्योंकि आत्मा समझने से बाप ही याद आता है, फिर न देह है, न देह के संबंध हैं, न पदार्थ हैं, एक बाप ही संसार है
इसलिए अकालतख्त नशीन बाप के दिल तख्तनशीन स्वत: बनते हैं।
स्लोगन:-
निर्णय करने, परखने और ग्रहण करने की
शक्ति को धारण करना ही होली-हंस बनना है।
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