"मीठे बच्चे - बाप तुम्हें
यह पढ़ाई जो पढ़ा रहे हैं, यही उनकी कृपा है, तुम तकदीर जगाकर आये हो
भविष्य नई दुनिया में देवी-देवता बनने"
प्रश्नः-
बच्चों ने बाप के सम्मुख कौन-सी प्रतिज्ञा की है?
उत्तर:-
तुमने प्रतिज्ञा की है - बाबा आप आये हो भारत को स्वर्ग
बनाने, हम आपकी श्रीमत पर चल भारत को स्वर्ग बनाने में आपके मददगार
बनेंगे। पवित्र बन भारत को पवित्र बनायेंगे।
गीत:-
तकदीर जगाकर आई हूँ...
ओम् शान्ति।
बच्चों ने गीत की लाईन सुनी। यह स्कूल अथवा युनिवर्सिटी है, कौन सी? गॉड फादरली
युनिवर्सिटी। गॉड फादर पढ़ाते हैं, भगवानुवाच। गॉड फादर कहा
जाता है बेहद के बाप को। लौकिक फादर को गॉड नहीं कहेंगे। एक गॉड को ही सब मनुष्य
मात्र गॉड फादर कहते हैं। वह है बेहद का फादर। इस सारे सृष्टि को रचने वाला गॉड
फादर है। लौकिक बच्चों को भी फादर होता है, जिसको बाबा कहा जाता है। यह
है बेहद का पारलौकिक बाप। लौकिक बाबा तो यहाँ बहुत हैं। हरेक को अपने बच्चे होते
हैं। तो बेहद के बाप से जरूर कोई वर्सा मिलना चाहिए। यहाँ तुम तकदीर बनाकर आये हो, बाप से बेहद सुख का
वर्सा लेने। यहाँ कौन पढ़ाते हैं? भगवानुवाच। वहाँ मनुष्य
बैरिस्टरी, इन्जीनियरी, डॉक्टरी आदि पढ़ाते हैं, यहाँ तो बेहद का बाप
आकर पढ़ाते हैं। तो तुम यहाँ तकदीर बनाकर आये हो। तुमको मनुष्य से देवता बनाया
जाता है।
तुम जानते हो भारत में ही देवी-देवताओं का राज्य होता है।
भारत ही प्राचीन पुराने ते पुराना खण्ड है। 5 मुख्य खण्ड हैं, पहला नम्बर है भारत।
जब भारतवासी भारत खण्ड नई दुनिया में थे तो देवी-देवता राज्य करते थे।
लक्ष्मी-नारायण का राज्य था तब यह भारत नया था, सिर्फ भारतखण्ड ही था। उस
समय और कोई धर्म नहीं था। देवी-देवतायें पवित्र थे। यथा राजा रानी लक्ष्मी-नारायण
पवित्र थे, भारत बहुत धनवान था, हीरे तुल्य था। अब तो भारत
बहुत कंगाल है। कौड़ी तुल्य है। स्वर्ग में लड़ाई झगड़ा कुछ भी नहीं था। वाइसलेस
भारत था। इस समय, जबकि कलियुग है तो भारत अपवित्र है। कितना दु:ख है। अब इस
भारत को फिर से स्वर्ग कौन बनाते हैं? बाप समझाते हैं तुम तकदीर
जगाकर आये हो, मनुष्य से देवता बनने, जो बेहद का बाप ही बनाते
हैं। मनुष्य कोई सद्गति नहीं दे सकते। पतित मनुष्य किसको पावन बना नहीं सकते।
स्वर्ग में कभी ऐसे नहीं कहेंगे कि पतित-पावन आओ क्योंकि वहाँ सब पवित्र थे। भारत
सदा सुखी था फिर से भारत को सदा सुखी बनाना बाप का ही काम है। भारत शिवालय था।
परमपिता परमात्मा को शिव कहा जाता है। उसकी जयन्ती भारत में मनाते हैं। शिव
परमात्मा जो सबका बाप है वही आकर सबको दु:ख से छुड़ाते हैं। उस बाप को सब भूले हुए
हैं। शान्ति दाता, सुख दाता वह एक ही बाप है। भारत स्वर्ग था। पवित्र थे तो
शान्ति भी थी, तो सुख भी था। प्योरिटी, पीस, प्रासपर्टी थी।
सन्यासी भी भारत को मदद देने लिए सन्यास करते हैं कि पवित्रता की ताकत मिले। सभी
विकारी मनुष्य जाकर उनको माथा टेकते हैं। सन्यासी पवित्रता की मदद से भारत को थामते
हैं। भारत जैसा सुखी पवित्र खण्ड कोई होता नहीं। ऊंचे ते ऊंचा भारत खण्ड ही गाया
जाता है। फिर से भारत को नया बाप ही बनाते हैं। कोई भी मनुष्य को भगवान नहीं कहा
जा सकता है। न सबमें ईश्वर है। परन्तु सबमें 5 शैतान हैं। इन 5 विकारों को मिलाकर
रावण कहा जाता है। इस समय रावण का राज्य है। सभी विकारी पतित हैं। सतयुग में
पवित्र गृहस्थ धर्म था। सम्पूर्ण निर्विकारी थे। भारत में देवी-देवता राज्य करते
थे। अब ड्रामा अनुसार फिर भारत पुराना बना है। नई सृष्टि सो पुरानी जरूर बनेगी।
भारत में एक वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी का राज्य था, उनको स्वर्ग कहा जाता है।
जो स्थापन करता है बेहद का बाबा, इन माताओं द्वारा। शिव
शक्ति सेना मातायें हैं ना। जगत अम्बा भी गाई हुई है। मनुष्य नहीं जानते कि ऊंचे
ते ऊंच कौन है। सबसे ऊंचे ते ऊंच है परमपिता परमात्मा। फिर है ब्रह्मा विष्णु
शंकर। परमपिता परमात्मा का क्या पार्ट है? वह आकर भारत को पतित से
पावन बनाते हैं। ब्रह्मा द्वारा पावन दुनिया की स्थापना करते हैं। तुम
ब्रह्माकुमार कुमारियां राखी बाँधते हो कि हम भारत को पवित्र बनायेंगे। हे बाबा हम
आपकी श्रीमत पर चल पवित्र बन भारत को पवित्र बनाए फिर राज्य करेंगे। बाप आकर
ब्रह्मा द्वारा स्थापना कराते हैं। ब्रह्मा, प्रजापिता सबका बाप है। जगत
अम्बा है सबकी माता। भारतवासी गाते हैं तुम मात-पिता हम बालक तेरे... बाप स्वयं
आकर पढ़ाते हैं, यही कृपा करते हैं, जिससे हम भविष्य में बहुत
सुख देखेंगे। यहाँ तो बहुत दु:ख है इसलिए इनको नर्क कहा जाता है। डीटी वर्ल्ड सो
फिर डेविल वर्ल्ड बनती है। डीटी वर्ल्ड में दूसरा कोई खण्ड नहीं रहता है। बेहद का
बाप ही आकर बच्चों को बेहद वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी समझाते हैं, जो
और कोई समझा न सके।
तुम बच्चे बेहद के बाप से प्रतिज्ञा करते हो - हे बाबा, आप आये हो भारत को
स्वर्ग बनाने, हम श्रीमत पर चल भारत को स्वर्ग अथवा श्रेष्ठ बनाए फिर उन
पर राज्य करेंगे, इसको राजयोग की शिक्षा कहा जाता है। सन्यासियों का है हठयोग, घरबार छोड़ देते
हैं। तुमको छोड़ना नहीं है। इस पुरानी दुनिया को भूलना है। तुम अब नई दुनिया में
जाने वाले हो। बाप गाइड बनकर आये हैं। वह है लिबरेटर, सबको दु:खों से
छुड़ाने वाला। शिवबाबा का भारत है बर्थप्लेस। सोमनाथ का मन्दिर भी यहाँ है। मनुष्य
यह भूल गये हैं कि भारत बड़ा तीर्थ है। सभी मनुष्यों का बाप, जो सुख-शान्ति देते
हैं, उनका बर्थ प्लेस है। सबको भारत में आकर शिव के मन्दिर में
शिव को नमन करना चाहिए। सबसे श्रेष्ठ मत है भगवान की। श्री श्री शिवबाबा बेहद का
सुख देने वाला है। सुख मिलता है बाप से। विनाश सामने खड़ा है। इस महाभारी लड़ाई
द्वारा सुखधाम शान्तिधाम के गेट खुलने वाले हैं। तुम बी.के. भारत को स्वर्ग बनाने
के लिए तन-मन-धन से सेवा कर रहे हो। जैसे गाँधी की मत पर सबने तन-मन-धन से सेवा कर
फॉरेन के राज्य को भगा दिया। परन्तु अब बहुत दु:ख है। अब इस रावण पर जीत पानी है।
आधाकल्प रावण राज्य, आधाकल्प रामराज्य। द्वापर से लेकर देह-अभिमान में आने से
बाप को भूल जाते हैं और बाप को न जानने कारण लड़ते झगड़ते रहते हैं। तो भारतवासी
जब दु:खी हो जाते हैं तब ही बाप आते हैं बच्चों की किस्मत जगाने। यहाँ अन्धश्रद्धा
की कोई बात नहीं। यह तो पढ़ाई है। बाप ही आकर सारी नॉलेज देते हैं क्योंकि वह
नॉलेजफुल है। कहते हैं मेरे में सारे चक्र का ज्ञान है। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण
का राज्य था फिर राम सीता का राज्य था, शेर बकरी इकट्ठे जल पीते
थे। यथा राजा रानी तथा प्रजा थे। धर्म का उपकार था। अब तो घर-घर में दु:ख है। बाप
आकर सभी को सुखी बनाते हैं। तुम भारत माता शक्ति सेना हो। यह मन्दिर तुम्हारा है।
अब तुम राजयोग में बैठे हो, इसको राजयोग की पढ़ाई कहा जाता है। तुमको गॉड फादर पढ़ाते
हैं।
बाप ही आकर तुम माताओं द्वारा सबकी किस्मत जगाते हैं।
वन्दना की जाती है परमपिता परमात्मा की। देवताओं की भी वन्दना करते हैं। पतित
मनुष्य सन्यासियों की भी वन्दना करते हैं। तुम माताओं के लिए कहा जाता है वन्दे
मातरम्। तुम माताओं द्वारा ही भारत स्वर्ग बनता है। पवित्रता बिगर सुख मिल नहीं
सकता। जो बाप का बनेंगे, बाप को याद करेंगे, और संग तोड़ एक संग
जोड़ेंगे - वही शिवबाबा के पास चले जायेंगे। भारत में ही बाप अवतार लेते हैं। तुम
कितने दु:खी थे! कितने बच्चे आये हैं यहाँ सुख पाने के लिए! तुम सबकी रूहानी सोशल
सर्विस करते हो। तुम हो गुप्त सेना, जो रावण पर जीत पाकर स्वर्ग
के मालिक बनते हो। निराकार बाप निराकार आत्माओं से बात करते हैं। आत्मा आरगन्स
द्वारा सुनती है। आत्मा में 84 जन्मों के संस्कार हैं।
पहले वाले 84 जन्म लेते हैं, पिछाड़ी वाले कम लेंगे।
भारत सिरताज था। भारत ही कंगाल बना है, फिर सिरताज बन रहा है। यह
वही लड़ाई है जो 5 हजार वर्ष पहले लगी थी, जिससे भारत स्वर्ग बना था।
तुम्हारी है राजयोग की पढ़ाई। सन्यासियों का है हठयोग। तुम बच्चों को पुरानी
दुनिया को भूल एक बाप को याद करना है। योग अग्नि से ही तुम्हारे पाप कट जायेंगे और
कोई पावन बनने का उपाय नहीं है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का
यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
रात्रि क्लास - 28-06-68
यहाँ सभी बैठे हैं समझते हैं कि हम आत्मायें हैं, बाप बैठा है। आत्म
अभिमानी हो बैठना इसको कहा जाता है। सभी ऐसे नहीं बैठे हैं कि हम आत्मा हैं बाबा
के सामने बैठे हैं। अब बाबा ने याद दिलाया है तो स्मृति आयेगी अटेन्शन देंगे। ऐसे
बहुत हैं जिनकी बुद्धि बाहर भागती है। यहाँ बैठे भी जैसे कि कान बन्द हैं। बुद्धि
बाहर में कहाँ न कहाँ दौड़ती रहती है। बच्चे जो बाप की याद में बैठे हैं वे कमाई
कर रहे हैं। बहुतों का बुद्धि योग बाहर में रहता है, वह जैसे कि यात्रा में नहीं
हैं। टाइम वेस्ट होता है। बाप को देखने से भी बाबा याद पड़ेगा। नम्बरवार पुरुषार्थ
अनुसार तो है ही। कोई कोई को पक्की आदत पड़ जाती है। हम आत्मा हैं, शरीर नहीं हैं। बाप
नॉलेजफुल है तो बच्चों को भी नॉलेज आ जाती है। अभी वापिस जाना है। चक्र पूरा होता
है अभी पुरुषार्थ करना है। बहुत गई थोड़ी रही......इम्तिहान के दिनों में भी बहुत
पुरुषार्थ करने लग पड़ेंगे। समझेंगे नहीं तो नापास हो जायेंगे, पद भी बहुत कम हो
जायेगा। बच्चों का पुरुषार्थ तो चलता ही रहता है। देह-अभिमान के कारण विकर्म होंगे, तो उसका सौ गुणा
दण्ड हो जायेगा क्योंकि हमारी निन्दा कराते हैं। ऐसा कर्म नहीं करना चाहिए जो बाप
का नाम बदनाम हो, इसलिये गाते हैं सद्गुरु का निन्दक ठौर न पावे। ठौर माना
बादशाही। पढ़ाने वाला भी बाप है, और कहाँ भी सत्संग में एम
आब्जेक्ट नहीं है। यह है हमारा राजयोग। और कोई ऐसे मुख से कुछ कह न सके कि हम
राजयोग सिखलाते हैं। वह तो समझते हैं शान्ति में ही सुख है? वहाँ तो न दु:ख, न सुख की बात है।
शान्ति ही शान्ति है। फिर समझा जाता है इनकी तकदीर में कम है। सभी से तकदीर ऊंची
उनकी है जो पहले से पार्ट बजाते हैं। वहाँ उनको यह ज्ञान नहीं रहता। वहाँ संकल्प
ही नहीं चलेगा। बच्चे जानते हैं हम सभी अवतार लेते हैं। भिन्न भिन्न नाम रूप में
आते हैं। यह ड्रामा है ना। हम आत्मायें शरीर धारण कर इसमें पार्ट बजाती हैं। वह
सारा राज़ बाप बैठ समझाते हैं। तुम बच्चों को अन्दर में अतीन्द्रिय सुख रहता है।
अन्दर में खुशी रहती है। कहेंगे यह देही-अभिमानी है। बाप समझाते भी हैं तुम स्टूडेन्ट
हो। जानते हो हम देवता स्वर्ग के मालिक बनने वाले हैं। सिर्फ देवता भी नहीं, हम विश्व के मालिक
बनने वाले हैं। यह अवस्था स्थाई तब रहेगी जब कर्मातीत अवस्था होगी। ड्रामाप्लैन
अनुसार होनी है ज़रूर। तुम समझते हो हम ईश्वरीय परिवार में हैं। स्वर्ग की बादशाही
मिलनी है ज़रूर। जो सर्विस बहुत करेंगे उनको ऊंच पद मिलेगा। हम कम पद पायेंगे यह
अन्दर में रहेगा। जो जास्ती सर्विस करते हैं, बहुतों का कल्याण करते हैं
तो ज़रूर ऊंच पद मिलेगा। बाबा ने समझाया है यह योग की बैठक यहाँ हो सकती है। बाहर
सेन्टर पर ऐसे नहीं हो सकती है। चार बजे आना, नेष्टा में बैठना, वहाँ कैसे हो सकता
है। नहीं। सेन्टर में रहने वाले भल बैठे। बाहर वाले को भूले चुके भी कहना नहीं है।
समय ऐसा नहीं है। यह यहाँ ठीक है। घर में ही बैठे हैं। वहाँ तो बाहर से आना पड़ता
है। यह सिर्फ यहाँ के लिये है। बुद्धि में ज्ञान धारण होना चाहिए। हम आत्मा हैं।
उनका यह अकाल तख्त है। यह आदत पड़ जानी चाहिए। हम भाई-भाई हैं, भाई से हम बात करते
हैं। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो विकर्म विनाश हो जायें। अच्छा!
मीठे मीठे रूहानी बच्चों को रूहानी बाप व दादा का याद प्यार
गुड नाईट और नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार :-
1) अपने तन-मन-धन से रूहानी
सोशल सेवा करनी है। रावण पर जीत पाकर भारत को स्वर्ग बनाना है।
2) अपार सुख पाने के लिए
पवित्रता की प्रतिज्ञा कर और सब संग तोड़ एक बाप की याद में रहना है।
वरदान:-
बुद्धि द्वारा शुद्ध संकल्पों का भोजन स्वीकार करने वाले
सदा स्वच्छ होलीहंस भव
होलीहंस कभी भी बुद्धि द्वारा सिवाए ज्ञान के मोती के और
कुछ भी स्वीकार नहीं कर सकते। ब्राह्मण आत्मायें जो ऊंच चोटी हैं वह कभी भी नीचे
की बातें स्वीकार नहीं करती। होलीहंस अर्थात् सदा स्वच्छ, सदा पवित्र, पवित्रता ही
स्वच्छता है। होलीहंस संकल्प भी अशुद्ध नहीं कर सकते। सदा शुद्व संकल्पों का भोजन
खाने वाले होलीहंस सदा तन्दरूस्त रहते हैं। उन पर किसी का प्रभाव पड़ नहीं सकता।
स्लोगन:-
अपनी मन्सा द्वारा शान्ति कुण्ड को प्रत्यक्ष करने वाली
शान्तप्रिय आत्मा बनो।
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