“संगमयुग -
मौजों के नज़ारों का युग”
आज बापदादा
अपने छोटे बड़े बेफिकर बादशाहों को देख रहे हैं। संगमयुग पर ही इतनी बड़े ते बड़े
बादशाहों की सभा लगती है। किसी भी युग में इतने बादशाहों की सभा नहीं होती है। इस
समय ही बेफिकर बादशाहों की सभा कहो वा स्वराज्य सभा कहो, सभी देख रहे हो। छोटे बड़े यही जानते हैं और मानकर चलते हैं
कि हम सभी इस शरीर के मालिक शुद्ध आत्मा हैं। आत्मा कौन हुई? मालिक! स्वराज्य अधिकारी! छोटे में छोटा बच्चा भी यही मानते
हैं कि मैं बादशाह हूँ। तो बादशाहों की सभा वा स्वराज्य सभा कितनी बड़ी हुई! और
बादशाहों का बादशाह वा राजाओं का भी राजा बनाने वाले - वर्तमान के राजे सो भविष्य
के राजे,
ऐसे राजाओं को देख वा सर्व बेफिकर बादशाहों को देख कितना
हर्षित होंगे,
सारे कल्प में ऐसा बाप कोई होगा जिसके लाखों बच्चे बादशाह
हों। किसी से भी पूछो तो क्या कहते? नन्हा सा
बच्चा भी कहता ‘मैं लक्ष्मी-नारायण बनूँगा', सभी बच्चे ऐसे समझते हो ना। ऐसे बाप को ऐसे राज़े बच्चों के ऊपर कितना नाज़
होगा! आप सभी को भी यह ईश्वरीय फखुर है कि हम भी राजा फैमली के हैं। राज्यवंशी हैं?
तो आज बापदादा एक-एक बच्चे को देख रहे हैं। बाप के कितने भाग्यवान बच्चे हैं! हर एक बच्चा भाग्यवान है। साथ-साथ समय का भी सहयोग है क्योंकि यह संगमयुग जितना छोटा युग है उतना ही विशेषताओं से भरा हुआ युग है। जो संगमयुग पर प्राप्तियाँ हैं वह और कोई युग में नहीं हो सकती। संगमयुग है ही मौजों के नज़ारों का युग। मौजें ही मौजें हैं ना! खाओ तो भी बाप के साथ मौजों में खाओ। चलो तो भी भाग्यविधाता बाप के साथ हाथ देते चलो। ज्ञान-अमृत पिओ तो भी ज्ञान दाता बाप के साथ-साथ पिओ। कर्म करो तो भी करावनहार बाप के साथ निमित्त करने वाले समझ करो। सोओ तो भी याद की गोदी में सोओ। उठो तो भी भगवान से रूहरिहान करो। सारी दिनचर्या बाप और आप। और बाप है तो पाप नहीं है। तो क्या होगा! मौजें ही मौजें होंगी ना। बापदादा देख रहे थे तो सभी बच्चे मौजों में रहते हैं। यह छोटा सा जन्म लिया ही मौजें मनाने के लिए है। खाओ, पिओ याद की मौज में रहो। इस अलौकिक जन्म का धर्म अर्थात् धारणा "मौज" में रहना है। दिव्य कर्म सेवा की मौज में रहना है। जन्म का लक्ष्य ही है मौजों में रहना और सारे विश्व को सर्व मौजों वाली दुनिया बनाना। तो सवेरे से लेकर रात तक मौजों के नज़ारे में रहते हो ना! बेफिकर बादशाह हो करके दिन रात बिताते हो ना! तो सुना आज वतन में क्या देखा! बेफिकर बादशाहों की सभा। हरेक बादशाह अपने याद की मौज में बाप के दिलतख्तनशीन स्मृति के तिलकधारी थे। अच्छा - आज तो मिलने का दिन है इसलिए अपने बादशाहों से मिलने आये हैं। अच्छा -
तो आज बापदादा एक-एक बच्चे को देख रहे हैं। बाप के कितने भाग्यवान बच्चे हैं! हर एक बच्चा भाग्यवान है। साथ-साथ समय का भी सहयोग है क्योंकि यह संगमयुग जितना छोटा युग है उतना ही विशेषताओं से भरा हुआ युग है। जो संगमयुग पर प्राप्तियाँ हैं वह और कोई युग में नहीं हो सकती। संगमयुग है ही मौजों के नज़ारों का युग। मौजें ही मौजें हैं ना! खाओ तो भी बाप के साथ मौजों में खाओ। चलो तो भी भाग्यविधाता बाप के साथ हाथ देते चलो। ज्ञान-अमृत पिओ तो भी ज्ञान दाता बाप के साथ-साथ पिओ। कर्म करो तो भी करावनहार बाप के साथ निमित्त करने वाले समझ करो। सोओ तो भी याद की गोदी में सोओ। उठो तो भी भगवान से रूहरिहान करो। सारी दिनचर्या बाप और आप। और बाप है तो पाप नहीं है। तो क्या होगा! मौजें ही मौजें होंगी ना। बापदादा देख रहे थे तो सभी बच्चे मौजों में रहते हैं। यह छोटा सा जन्म लिया ही मौजें मनाने के लिए है। खाओ, पिओ याद की मौज में रहो। इस अलौकिक जन्म का धर्म अर्थात् धारणा "मौज" में रहना है। दिव्य कर्म सेवा की मौज में रहना है। जन्म का लक्ष्य ही है मौजों में रहना और सारे विश्व को सर्व मौजों वाली दुनिया बनाना। तो सवेरे से लेकर रात तक मौजों के नज़ारे में रहते हो ना! बेफिकर बादशाह हो करके दिन रात बिताते हो ना! तो सुना आज वतन में क्या देखा! बेफिकर बादशाहों की सभा। हरेक बादशाह अपने याद की मौज में बाप के दिलतख्तनशीन स्मृति के तिलकधारी थे। अच्छा - आज तो मिलने का दिन है इसलिए अपने बादशाहों से मिलने आये हैं। अच्छा -
सदा बेफिकर
बादशाह,
मौजों की जीवन में मौजों के नज़ारे देखने वाले, सदा भाग्यवान बाप के साथ-साथ रहने वाले, ऐसे स्वराज्य अधिकारी, दिलतख्तनशीन, पद्मापद्म भाग्यवान बच्चों को बापदादा का याद-प्यार और
नमस्ते।
छोटे बच्चों
से :- सभी बच्चे अपने को महान आत्मायें समझते हुए पढ़ते हो, खेलते हो, चलते हो? हम महात्मायें हैं, सदा यह खुशी
रखो,
नशा रखो कि हम ऊंचे ते ऊंचे भगवान के बच्चे हैं। भगवान को
देखा है?
कहाँ हैं? कोई कहे हमको भी
भगवान से मिलाओ तो मिला सकते हो? सभी भगवान के बच्चे
हो तो भगवान के बच्चे कभी लड़ते तो नहीं हो? चंचलता करते
हो? भगवान के बच्चे तो योगी होते हैं फिर आप चंचलता क्यों करते
हो? सदा अपने को महान आत्मा, योगी आत्मा
समझो। क्या बनेंगे?
लक्ष्मी-नारायण दोनों ही एक साथ बनेंगे? या कभी लक्ष्मी बनेंगे, कभी नारायण
बनेंगे! लक्ष्मी बनना पंसद है? अच्छा - सदा नारायण
बनना चाहते हो तो सदा शान्त योगी जीवन में रहना और रोज़ सुबह उठकर गुडमार्निंग
जरूर करना। ऐसे नहीं देरी से उठो और जल्दी-जल्दी तैयार होकर चले जाओ। 3 मिनट भी याद में बैठ गुडमार्निंग जरूर करो, बातें करो पीछे तैयार हो। यह व्रत कभी भी भूलना नहीं। अगर
गुडमार्निंग नहीं करेंगे तो खाना नहीं खायेंगे। खाना याद रहेगा तो पहले
गुडमार्निंग करना याद रहेगा। गुडमार्निंग करके फिर खाना खाना। याद करो ज्ञान की
पढ़ाई को,
अच्छे गुण धारण करो तो विश्व में आप रूहानी गुलाब बन खुशबू
फैलायेंगे। गुलाब के फूल सदा खिले रहते हैं और सदा खुशबू देते हैं। तो ऐसे ही
खुशबूदार फूल हो ना! सदा खुश रहते हो या कभी थोड़ा दु:ख भी होता है? जब कोई चीज नहीं मिलती होगी तब दु:ख होता होगा या मम्मी
डेडी कुछ कहते होंगे तो दु:ख होता होगा। ऐसा कुछ करो ही नहीं जो मम्मी डेडी कहें।
ऐसा चलो जैसा फरिश्ते चल रहे हैं। फरिश्तों का आवाज़ नहीं होता। मनुष्य जो होते
हैं वह आवाज़ करते हैं। आप ब्राह्मण सो फरिश्ते आवाज़ नहीं करो। ऐसा चलो जो किसी
को पता ही न चले। खाओ पियो,
चलो फरिश्ता बन करके। बापदादा सभी बच्चों को बहुत-बहुत बधाई
दे रहे हैं। बहुत अच्छे बच्चे हैं और सदा अच्छे ही बनकर रहना। अच्छा।
बच्चियों से:-
कुमारी जीवन की क्या महिमा है? कुमारियों को पूजा
जाता है,
क्यों? पवित्र आत्मायें हैं।
तो सभी पवित्र आत्मायें पवित्र याद से औरों को भी पवित्र बनाने की सेवा में रहने
वाली हो ना! चाहे छोटी हो,
चाहे बड़ी हो लेकिन बाप का परिचय तो सभी को दे सकते हो ना।
छोटे भी बहुत अच्छा भाषण करते हैं। बापदादा सबसे छोटे से छोटी कुमारी को बड़ी स्टेज
पर भाषण करने के लिए कहें तो तैयार हो? संकोच तो नहीं
करेंगी। डर तो नहीं जायेंगी! सदा अपने को विश्व की सर्व आत्माओं का कल्याण करने
वाली विश्व कल्याणकारी आत्मा समझो। रिवाजी साधारण कुमारियाँ नहीं लेकिन श्रेष्ठ
कुमारी। श्रेष्ठ कुमारी श्रेष्ठ काम करेगी ना! सबसे श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ कार्य है
बाप का परिचय दे बाप का बनाना। दुनिया वाले भटक रहे हैं, ढूँढ रहे हैं और तुम लोगों ने जान लिया, पा लिया, कितनी तकदीरवान, भाग्यवान हो। भगवान के बन गये इससे बड़ा भाग्य और कुछ होता
है। तो सदा भाग्यवान आत्मा हूँ - इसी खुशी में रहो। यह खुशी अगर गुम हुई तो फिर
कभी रोयेंगे,
कभी चंचलता करेंगे। सदा आपस में भी प्यार से रहो और लौकिक
माता-पिता के भी कहने पर आज्ञाकारी रहो। पारलौकिक बाप की सदा याद में रहो, तब ही श्रेष्ठ कुमारियाँ बन सकेंगी। तो सदा अपने को श्रेष्ठ
कुमारी,
पूज्य कुमारी समझो। मन्दिरों में जो शक्तियों की पूजा होती
है, वही हो ना! एक-एक कुमारी बहुत बड़ा कार्य कर सकती। विश्व
परिवर्तन करने के निमित्त बन सकती हो। बापदादा ने विश्व परिवर्तन का कार्य बच्चों
को दिया है। तो सदा बाप और सेवा की याद में रहो। विश्व परिवर्तन करने की सेवा के
पहले अपना परिवर्तन करो। जो पहले की जीवन थी उससे बिल्कुल बदलकर बस श्रेष्ठ आत्मा
हूँ,
पवित्र आत्मा हूँ, महान आत्मा
हूँ,
भाग्यवान आत्मा हूँ, इसी याद में
रहो। यह याद स्कूल या कालेज में जाकर भूलती तो नहीं हो ना! संग का रंग तो नहीं
लगता! कभी खाने पीने की तरफ कहाँ आकर्षण तो नहीं जाती। थोड़ा बिस्कुट या आइपीम खा
लें,
ऐसी इच्छा तो नहीं होती! सदैव याद में रहकर बनाया हुआ भोजन
ब्रह्मा भोजन खाने वाली - ऐसे पक्के! देखना वहाँ जाकर संग में नहीं आ जाना।
कुमारियाँ जितना भाग्य बनाने चाहो बना सकती हो। छोटे-पन से लेकर सेवा के शौक में
रहो। पढ़ाई भी पढ़ो और पढ़ाना भी सीखो। छोटेपन में होशियार हो जायेंगे तो बड़े
होकर चारों ओर की सेवा में निमित्त बन जायेंगे। स्थापना के समय भी छोटे-छोटे थे, वह अब कितनी सेवा कर रहे हैं, आप लोग उनसे भी होशियार बनना। कल की तकदीर हो। कल भारत स्वर्ग बन जायेगा तो कल
की तकदीर आप हो। कोई भी आपको देखे तो अनुभव करे कि यह साधारण नहीं, विशेष कुमारियाँ हैं।
वह पढ़ाई
पढ़ते भी मन की लगन ज्ञान की पढ़ाई में रहनी चाहिए। पढ़ने के बाद भी क्या लक्ष्य
है? श्रेष्ठ आत्मा बन श्रेष्ठ कार्य करने का है। नौकरी की टोकरी
उठाने का तो नहीं है ना! अगर कोई कारण होता है तो वह दूसरी बात है। माँ बाप के पास
कमाई का दूसरा कोई साधन नहीं है, तो वह हुई मजबूरी।
लेकिन अपना वर्तमान और भविष्य सदा याद रखो। काम में क्या आयेगा? यह ज्ञान की पढ़ाई ही 21 जन्म काम
आयेगी इसलिए निमित्त मात्र अगर लौकिक कार्य करना भी पड़ता तो भी मन की लगन बाप और
सेवा में रहे। तो सभी राइट हैन्ड्स बनना, लेफ्ट हैन्ड
नहीं। अगर इतने सब राइटहैण्ड हो जाएं तो विनाश हुआ कि हुआ। इतनी शक्तियाँ विजय का
झण्डा लेकर आ जाएं तो रावण राज्य का समय समाप्त हो जाए। जब ब्रह्माकुमारी बनना है
तो फिर डिग्री क्या करेंगी?
यह तो निमित्त मात्र जनरल नॉलेज से बुद्धि विशाल बने उसके
लिए यह पढ़ाई पढ़ी जाती। मन की लगन से नहीं, ऐसे नहीं बाकी
एक साल में यह डिग्री लें,
फिर दूसरे साल में यह डिग्री लें... ऐसे करते-करते काल आ
जाए तो... इसलिए जो निमित्त हैं, उनसे राय लेते रहो।
आगे पढ़ें या न पढ़ें। कई हैं जो पढ़ाई की शौक में अपना वर्तमान और भविष्य छोड़
देती हैं,
धोखा खा लेती हैं। अपने जीवन का फैसला स्वयं खुद को करना
है। माँ बाप कहें,
नहीं। स्वयं जज बनो। आप शिव शक्तियाँ हो, आपको कोई बन्धन में बाँध नहीं सकता। बकरियों को बन्धन में
बांध सकते हैं,
शक्तियों को नहीं। शक्तियों की सवारी शेर पर है, शेर खुले में रहता है, बन्धन में
नहीं,
तो सदा हम बाप की राइट हैण्ड हैं - यह याद रखना। अच्छा।
टीचर्स के
साथ:- सदा यही स्मृति में रहता है ना कि हम निमित्त सेवाधारी हैं। करावनहार
निमित्त बनाए करा रहा है। तो करावनहार जिम्मेवार हुआ ना। निमित्त बनने वाले सदा
हल्के। डायरेक्शन मिला,
कार्य किया और सदा हल्के रहे। ऐसे रहते हो या कभी सेवा का
बोझ अनुभव होता है?
क्योंकि अगर बोझ होगा तो सफलता नहीं होगी। बोझ समझने से कोई
भी कर्म यथार्थ नहीं होगा। स्थूल में भी जब कोई कार्य का बोझ पड़ जाता है तो कुछ
तोड़ेंगे,
कुछ फोड़ेंगे, कुछ मनमुटाव
होगा,
डिस्टर्ब होंगे। कार्य भी सफल नहीं होगा। ऐसे यह अलौकिक
कार्य भी बोझ समझकर किया तो यथार्थ नहीं होगा। सफल नहीं हो सकेंगे। फिर बोझ बढ़ता
जाता है। तो संगमयुग का जो श्रेष्ठ भाग्य है हल्के हो उड़ने का, वह ले नहीं सकेंगे। फिर संगमयुगी ब्राह्मण बन किया क्या!
इसलिए सदा हल्के बन निमित्त समझते हुए हर कार्य करना - इसी को ही सफलतामूर्त कहा
जाता है। जैसे आजकल के जमाने में पैर के नीचे पहिये लगाकर दौड़ते हैं, वह कितने हल्के होते हैं। उनकी रफ्तार तेज हो जाती है। तो
जब बाप चला रहा है,
तो श्रीमत के पहिये लग गये ना। श्रीमत के पहिये लगने से
स्वत: ही पुरूषार्थ की रफ्तार तेज हो जायेगी। सदा ऐसे सेवाधारी बनकर चलो। जरा भी
बोझ महसूस नहीं करो। करावनहार जब बाप है तो बोझ क्यों? इसी स्मृति से सदा उड़ती कला में जाते रहो। बस सदा उड़ते
चलो। इसको कहा जाता है नम्बरवन योग्य सेवाधारी। बस बाबा, बाबा और बाबा। हर सेकेण्ड यह अनहद साज़ बजता रहे। बस
"बाबा और मैं",
सदा ऐसे समाये रहो तो तीसरा बीच में आ नहीं सकता। जहाँ सदा
समाये होंगे,
दोनों राज़ी होंगे तो बीच में कोई नहीं आयेगा। इसको ही कहा
जाता है श्रेष्ठ सेवाधारी। ऐसे हो? दूसरा कुछ
नहीं देखो,
कुछ नहीं सुनो। सुनने से भी प्रभाव पड़ता। बस बाबा और मैं, सदा मौज मनाओ। मेहनत तो बहुत की, अभी मौज मनाने का समय है। एक गीत भी है ना मौजे ही मौजे...
उठो,
चलो,
सेवा करो, सोओ सब मौज में। खूब
नाचो,
गाओ,
खुशी में रहो। सेवा भी खुशी-खुशी से नाचते-नाचते करो। ऐसे
नहीं लुढ़ते लमते,
(गिरते चढ़ते) करो। संगम पर सर्व सम्बन्ध की मौजें हैं। तो
खूब मौज मनाओ। सदा मौजों के ही नजारे में रहो। अच्छा!
वरदान:-
कर्मो की
गुह्य गति के ज्ञाता बन धर्मराज़ पुरी की सजाओं से बचने वाले विकर्माजीत भव |
सजाओं के
अनुभव को ही धर्मराजपुरी कहते हैं, बाकी
धर्मराजपुरी कोई अलग स्थान नहीं है, लास्ट में
अपने किये हुए पाप जमदूत के डरावने रूप में सामने आते हैं। उस समय पश्चाताप और
वैराग्य की घड़ी होती है,
छोटे-छोटे पाप भी भूत की तरह लगते हैं। पश्चाताप की
त्राहि-त्राहि होती है इसलिए उन सजाओं की फीलिंग से बचने के लिए कर्मो की गुह्य
गति के ज्ञाता बन सदा श्रेष्ठ कर्म करो और विकर्माजीत बनो।
स्लोगन:-
जो तन-मन-धन
से बाप पर पूरा बलिहार जाते हैं वही गले का हार बनते हैं।
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