27-03-2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन




"मीठे बच्चे - विजयी रत्न बनने के लिए जीते जी मरकर देही-अभिमानी बन बाप के गले का हार बनने का पुरुषार्थ करो"
प्रश्नः-  स्वदर्शन चक्र का राज़ स्पष्ट होते हुए भी बच्चों में धारणा नम्बरवार होती है - क्यों?
उत्तर:-  क्योंकि यह ड्रामा बहुत कायदे अनुसार बना हुआ है। ब्राह्मण ही 84 जन्मों को समझकर याद कर सकते हैं लेकिन माया ब्राह्मणों को ही याद में विघ्न डालती है, घड़ी-घड़ी योग तोड़ देती है। अगर एक समान धारणा हो जाए, सब सहज पास हो जाएं तो लाखों की माला बन जाये इसलिए राजधानी स्थापन होने के कारण नम्बरवार धारणा होती है।
गीत:-  मरना तेरी गली में...
Om peace The children heard the song. This is the birth of Marjeevapane. When the human leaves leave the world , the world is destroyed , the soul separates , neither unclean nor uncle will remain. It is said - it died, i.e. the soul came and met the divine. In fact there is no go. But humans understand that the soul has returned or lightened in the light of light. Now father understands sit - this is why children know that the soul needs to reinforce. Rebirth is called the birthplace. The souls who come in the back , may have to take birth. Bus , it will leave then go back. There is a huge account of taking revenge. Thousands of humans are not able to explain each other. Now you say kids - O Baba ,We have come to become the necklace of your neck now, to sacrifice everything that is related to our body, that means, your life has come. The whole body will have to do with the body. The soul alone could not do it. The father explains sitting - when Rudra yogi feels that there is a picture of Shiva in the form of soil and many of the slagram images are made of soil. Now what are the sailigams that make and worship them ? So Shiva will understand that this is the divine God. Keeps Shiva chief. The spirits are stacked. So they too make saligram too. 10 thousand or 1 lakh also make saligram. Made daily and broke again. It seems very hard. Now he not worship ,न यज्ञ रचवाने वाले ही जानते हैं कि यह कौन है। क्या इतनी सब आत्मायें पूज्यनीय लायक हैं? No. Well , think of India as 33 million saligrama make , he can not even help because all the parents did not allow. It is a big mistake to understand. Spend four lakh rupees, to make Rudra Yagya. Well , now the Supreme God Shiva is just so all the rest of the saligrama which children , who are worshiped ? At this time, you only know the father and the children become a child. The person too helps. Shiv who remembers , he will come in heaven. Whoever does not give good knowledge will even come to heaven. How many he will be! But the main 108Are there Look at Mamma too tremendous gems! How much is it? Now you have to become children-wise. Birth-born You are self-esteemed. No human will say that I am the child of the divine soul. If they are children, their entire biography should be known. Biochemistry of paralytic father is very tremendous. So the children say, Now by living, you will surely become your necklace necklace. Spirits also have a big beetle. Similarly, man is the great beast of creation. Prajapita is Brahma main. These Adam , Dev , Mahavira also says. Now this is a big mistake.

तुम समझते हो हम सब आत्मायें एक निराकार बाप की सन्तान हैं और यह मनुष्य सृष्टि का सारा सिजरा है जिसको जिनॉलॉजिकल ट्री कहा जाता है। जैसे सरनेम होता है ना - अग्रवाल, फिर उनके बच्चे पोत्रे अग्रवाल ही होंगे। सिजरा बनाते हैं ना। एक से फिर बढ़ते-बढ़ते बड़ा झाड़ हो जाता है। जो भी आत्मायें हैं वह शिवबाबा के गले का हार हैं। वह तो अविनाशी है। प्रजापिता ब्रह्मा भी तो है। नई दुनिया कैसे रची जाती है, क्या प्रलय हो जाती है? नहीं। दुनिया तो कायम है सिर्फ जब पुरानी होती है तो बाप आकर उनको नया बनाते हैं। अभी तुम समझते हो हम नये ते नये थे। हमारी आत्मा पवित्र नई थी। प्योर सोना थी, उनसे फिर हम आत्माओं को जेवर (शरीर) भी सोना मिला, उसको काया कल्पतरू कहते हैं। यहाँ तो मनुष्यों की एवरेज आयु 40-45 वर्ष रहती है। कोई-कोई की करके 100 वर्ष होती है। वहाँ तो तुम्हारी आयु एवरेज 125 वर्ष से कम होती नहीं। तुम्हारी आयु कल्प वृक्ष समान बनाते हैं। कभी अकाले मृत्यु नहीं होगी। तुम आत्मायें शिवबाबा के बच्चे हो, ब्रह्मा द्वारा जरूर ब्राह्मण पैदा होंगे, उनसे फिर प्रजा रची जाती है। पहले-पहले तुम ब्राह्मण बनते हो ब्रह्मा मुख वंशावली। शिवबाबा तो एक है फिर माता कहाँ? यह बड़ा गुह्य राज़ है। मैं इन द्वारा आकर तुम बच्चों को एडाप्ट करता हूँ। तो तुम पुरानी दुनिया से जीते जी मरते हो। वह जो एडाप्ट करते हैं वह धन देने के लिए करते हैं। बाप एडाप्ट करते हैं स्वर्ग का वर्सा देने के लिए, लायक बनाते हैं। साथ में ले जायेंगे इसलिए इस पुरानी दुनिया से जीते जी मरना है। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बन बाप का बनना है। हम वहाँ के रहने वाले हैं फिर सतयुग में सुख का पार्ट बजाया। यह बातें बाप समझाते हैं। शास्त्रों में तो हैं नहीं। अब बाप बैठ तुम आत्माओं को पवित्र बनाते हैं। आत्मा की मैल निकालते हैं। तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र मिलता है। उन्हों ने फिर तीजरी की कथा बैठ बनाई है। वास्तव में बात यहाँ की है। तुमको ब्रह्माण्ड से लेकर सारे सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का सारा समाचार मिल जाता है। बाप एक ही बार आकर समझाते हैं। सन्यासी तो पुनर्जन्म लेते रहते हैं। यह तो आया और बच्चों को पढ़ाया। बस। यह तो नई बात हो जाती है। शास्त्रों में यह बातें हैं नहीं। यह बहुत बड़े ते बड़ा कॉलेज है। कायदा है एक हफ्ता तो अच्छी रीति समझना पड़े। भट्ठी में बैठना पड़े। गीता का पाठ अथवा भागवत का पाठ भी एक हफ्ता रखते हैं ना, तो सात रोज़ भट्ठी में बैठना पड़े। विकारी तो सभी हैं, भले सन्यासी घरबार छोड़ निर्विकारी बनते हैं फिर भी जन्म विकार से लेकर फिर निर्विकारी बनने लिए सन्यास करते हैं। कई पुनर्जन्म को भी मानते हैं क्योंकि मिसाल देखते हैं। कोई बहुत वेद-शास्त्र पढ़ते-पढ़ते शरीर छोड़ते हैं तो उन संस्कारों अनुसार फिर जन्म लेते हैं, तो छोटेपन में ही शास्त्र अध्ययन हो जाते हैं। जन्म ले अपने को अपवित्र समझ फिर पवित्र बनने के लिए सन्यास करते हैं। तुम तो एक ही बार पवित्र बन देवता बनते हो। तुमको फिर सन्यास नहीं करना पड़ेगा। तो उनका सन्यास अधूरा हुआ ना। यह बातें खुद भी समझा नहीं सकते हैं। बाबा बैठ समझाते हैं। वह है उत्तम ते उत्तम बाप, जिसके तुम बच्चे बने हो। यह स्कूल भी है, रोजाना नई-नई बातें निकलती हैं। कहते हैं आज गुह्य ते गुह्य सुनाता हूँ। नहीं सुनेंगे तो धारणा कैसे होगी? अब बाप बैठ समझाते हैं तुम मेरे बने हो तो शरीर का भान छोड़ो, मैं गाइड बन आया हूँ वापिस ले जाने।

तुम हो पाण्डव सम्प्रदाय। वह जिस्मानी पण्डे हैं, तुम रूहानी पण्डे हो। वह जिस्मानी यात्रा पर ले जाते हैं। तुम्हारी है रूहानी यात्रा। उन्होंने तो पाण्डवों को हथियार दे, युद्ध के मैदान में दिखाया है। अभी तुम बच्चों में भी ताकत चाहिए। बहुत होते जायेंगे तो फिर ताकत भी बढ़ती जायेगी। तो बाप बैठ समझाते हैं कि मैंने तुमको गोद में लिया है इस ब्रह्मा द्वारा इसलिए इनको मात-पिता कहा जाता है। यह तो सब कहते हैं तुम मात-पिता हम बालक तेरे। अच्छा, उनको तो गॉड फादर कहा जाता है। गॉड मदर तो नहीं कहा जाता। तो मदर कैसे कहते? मनुष्य फिर जगदम्बा को मदर समझ लेते हैं। परन्तु नहीं, उनके भी मात-पिता हैं, उनकी माता भला कौन सी है? यह बड़ी गुह्य बातें हैं। गायन तो है परन्तु सिद्ध कर कौन समझाये? तुम जानते हो यह मात-पिता है। पहले है माता। बरोबर तुमको इस ब्रह्मा माता के पास पहले आना पड़े। इनमें प्रवेश कर तुमको एडाप्ट करता हूँ, इसलिए यह मात-पिता ठहरे। यह बातें कोई शास्त्र में नहीं हैं। यह बाप बैठ समझाते हैं - कैसे तुम मुख वंशावली बनते हो। मैं ब्रह्मा मुख से तुमको रचता हूँ। कोई राजा है, कहेंगे मुख से तुमको कहता हूँ तुम मेरे हो। यह आत्मा कहती है। परन्तु उनको फिर भी मात-पिता नहीं कहेंगे। यह बड़ी वन्डरफुल बात है। तुम जानते हो हम शिवबाबा के बने हैं तो यह देह का भान छोड़ना पड़े। अपने को आत्मा अशरीरी समझना मेहनत का काम है। इसको कहा ही जाता है राजयोग और ज्ञान। दोनों अक्षर आते हैं। मनुष्य जब मरते हैं तो उनको कहते हैं राम-राम कहो या गुरू लोग अपना नाम दे देते हैं। गुरू मर जाता तो फिर उनके बच्चे को गुरू कर देते हैं। यहाँ तो बाप जायेंगे तो सभी को जाना है। यह मृत्युलोक का अन्तिम जन्म है। बाबा हमको अमरलोक में ले जाते हैं, वाया मुक्तिधाम जाना है।

यह भी समझाया जाता है जब विनाश होता है तो यह कलियुग का पुर नीचे चला जाता है। सतयुग ऊपर आ जाता है। बाकी कोई समुद्र के अन्दर नहीं चले जाते हैं। यहाँ तुम बच्चे सागर के पास आते हो रिफ्रेश होने। यहाँ तुम सम्मुख ज्ञान डांस देखते हो, दिखाते हैं गोप-गोपियों ने कृष्ण को डांस कराई, यह बात इस समय की है। चात्रक बच्चों के सामने बाप की मुरली चलती है। बच्चों को भी सीखना पड़े। फिर जो जितना सीखे। समझाना है बेहद के बाप से स्वर्ग का वर्सा लो। हे भगवान कहते हो, वह तो है रचयिता। जरूर स्वर्ग ही रचेंगे। यह एक ही बाप है जो स्वर्ग रचते हैं वो फिर आधाकल्प चलता है। बाबा तुम्हें कितने राज़ समझाते हैं। बच्चों को मेहनत कर धारणा करनी है। स्वदर्शन चक्र का राज़ भी बाबा ने कितना साफ बताया है। 84 जन्मों के चक्र को ब्राह्मण ही याद कर सकते हैं। यह है बुद्धि का योग लगाकर चक्र को याद करना। परन्तु माया घड़ी-घड़ी योग तोड़ देती है, विघ्न डालती है। सहज हो तो फिर सब पास कर लें। लाखों की माला बन जाये। यह तो ड्रामा ही कायदे अनुसार है। मुख्य हैं 8, उनमें फ़र्क नहीं पड़ सकता। त्रेता के अन्त में जितने प्रिन्स-प्रिन्सेज हैं सभी मिलकर जरूर यहाँ ही पढ़ते होंगे। प्रजा भी पढ़ती होगी। यहाँ ही किंगडम स्थापन होती है। बाप ही किंगडम स्थापन करते हैं और कोई प्रीसेप्टर किंगडम नहीं स्थापन करते। यही बड़ा वन्डरफुल राज़ है। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य कहाँ से आया? कलियुग में तो राजाई है नहीं। अनेक धर्म हैं। भारतवासी कंगाल हैं। कलियुग की रात पूरी हो, दिन शुरू हुआ और बादशाही चली। यह क्या हुआ! अल्लाह अवलदीन का खेल दिखाते हैं ना। तो कारून के खजाने निकल आते हैं। तुम सेकेण्ड में दिव्य दृष्टि से वैकुण्ठ देख आते हो। अच्छा!

मात-पिता, बापदादा, बच्चे सारी फैमली इक्ट्ठी बैठी है। मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) बाप समान सभी को रिफ्रेश करने की सेवा करनी है। चात्रक बन ज्ञान डांस करनी और करानी है।



2) इस शरीर का भान छोड़ पुरानी दुनिया से जीते जी मरना है। अशरीरी रहने का अभ्यास करना है। स्वयं को स्वर्ग के वर्से का लायक भी बनाना है।

वरदान:-         उड़ती कला के वरदान द्वारा सदा आगे बढ़ने वाले सर्व बन्धन मुक्त भव 
बाप का बनना अर्थात् उड़ती कला के वरदानी बनना। इस वरदान को जीवन में लाने से कभी किसी कदम में भी पीछे नहीं होंगे। आगे ही आगे बढ़ते रहेंगे। सर्वशक्तिमान बाप का साथ है तो हर कदम में आगे हैं। स्वयं भी सदा सम्पन्न और दूसरों को भी सम्पन्न बनाने की सेवा करते हैं। वे किसी भी प्रकार की रुकावट में अपने कदमों को रोकते नहीं। ऐसे वरदानी बच्चे किसी के बन्धन में आ नहीं सकते, सर्व बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं।
स्लोगन:-        जिनके पास सर्व शक्तियों का स्टॉक है, प्रकृति उनकी दासी बन जाती है।


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