पहले पहले यह जानना जरुरी है कि अपना असली लक्ष्य क्या है? वो भी अच्छी तरह से
बुद्धि में धारण करना है तब ही पूर्ण रीति से उस लक्ष्य में उपस्थित हो सकेंगे।
अपना असली लक्ष्य हैं - मैं आत्मा उस परमात्मा की संतान हूँ। असुल में कर्मातीत
हूँ फिर अपने आपको भूलने से कर्मबन्धन में आ गई, अब फिर से वो याद आने से, इस ईश्वरीय योग में
रहने से अपने किये हुए विकर्म विनाश कर रहे हैं।
तो अपना लक्ष्य हुआ मैं आत्मा
परमात्मा की संतान हूँ। बाकी कोई अपने को हम सो देवता समझ उस लक्ष्य में स्थित
रहेंगे तो फिर जो परमात्मा की शक्ति है वो मिल नहीं सकेगी। और न फिर तुम्हारे
विकर्म विनाश होंगे अब यह तो अपने को फुल ज्ञान है, मैं आत्मा परमात्मा की
संतान कर्मातीत हो भविष्य में जाकर जीवनमुक्त देवी देवता पद पायेंगे, इस लक्ष्य में रहने
से वह ताकत मिल जाती है। अब यह जो मनुष्य चाहते हैं हमको सुख शान्ति पवित्रता
चाहिए, वो भी जब पूर्ण योग होगा तब ही प्राप्ति होगी। बाकी देवता
पद तो अपनी भविष्य प्रालब्ध है, अपना पुरुषार्थ अलग है और
अपनी प्रालब्ध भी अलग है। तो यह लक्ष्य भी अलग है, अपने को इस लक्ष्य में नहीं
रहना है कि मैं पवित्र आत्मा आखरीन परमात्मा बन जाऊंगी, नहीं। परन्तु हमको
परमात्मा के साथ योग लगाए पवित्र आत्मा बनना है, बाकी आत्मा को कोई परमात्मा
नहीं बनना है।
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