❍ 25 / 01 / 18 की मुरली से चार्ट ❍ TOTAL MARKS:- 100


∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 5*4=20)

➢➢ *देह के सब धर्मों को छोड़ , स्वयं को अशरीरी आत्मा समझ एक बाप को याद किया ?*

➢➢ *बाप ने जो नॉलेज दी, उस पर विचार सागर मंथन कर सबको बाप का पैगाम दिया ?*

➢➢ *मर्यादा पुरुषोत्तम बन सदा उडती कला में उड़ते रहे ?*

➢➢ *एक बाप के श्रेष्ठ संग में रह दूसरों के संग के प्रभाव से मुक्त रहे ?*
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 *अव्यक्त पालना का रिटर्न* 
         ❂ *तपस्वी जीवन
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✧  एकाग्रता अर्थात् एक ही श्रेष्ठ संकल्प में सदा स्थित रहना। जिस एक बीज रूपी संकल्प में सारा वृक्ष रूपी विस्तार समाया हुआ है। एकाग्रता को बढ़ाओ तो सर्व प्रकार की हलचल समाप्त हो जायेगी। *एकाग्रता के आधार पर जो वस्तु जैसी हैवैसी स्पष्ट देखने में आयेगी। ऐसी एकाग्र स्थिति में स्थित होने वाला स्वयं जो हैजैसा है अथवा जो वस्तु जैसी है वैसी स्पष्ट अनुभव होगी।*

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∫∫ 2 ∫∫ तपस्वी जीवन (Marks:- 10)

➢➢ *इन शिक्षाओं को अमल में लाकर बापदादा की अव्यक्त पालना का रिटर्न दिया ?*

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 *अव्यक्त बापदादा द्वारा दिए गए* 
             ❂ *श्रेष्ठ स्वमान* 
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   *"मैं ब्राह्मण सो फरिश्ता हूँ"*

   सभी अपने को ब्राह्मण सो फरिश्ता समझते हो? अभी ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण से फरिश्ता बनने वाले हैं फिर फरिश्ता सो देवता बनेंगे -वह याद रहता है? *फरिश्ता बनना अर्थात् साकार शरीरधारी होते हुए लाइट रूप में रहना अर्थात् सदा बुद्धि द्वारा ऊपर की स्टेज पर रहना। फरिश्ते के पांव धरनी पर नहीं रहते।* ऊपर कैसे रहेंगे? बुद्धि द्वारा। बुद्धि रूपी पांव सदा ऊँची स्टेज पर। ऐसे फरिश्ते बन रहे हो या बन गये हो?

  ब्राह्मण तो हो ही - अगर ब्राह्मण न होते तो यहाँ आने की छुट्टी भी नहीं मिलती। लेकिन ब्राह्मण ने फरिश्तेपन की स्टेज कहाँ तक अपनाई है?*फरिश्तों को ज्योति की काया दिखाते हैं। प्रकाश की काया वाले। जितना अपने को प्रकाश स्वरूप आत्मा समझेंगे - प्रकाशमय तो चलते फिरते अनुभव करेंगे जैसे प्रकाश की काया वाले फरिश्ते बनकर चल रहे हैं।*

  *फरिश्ता अर्थात् अपनी देह के भान का भी रिश्ता नहीं, देहभान से रिश्ता टूटना अर्थात् फरिश्ता। देह से नहीं, देह के भान से। देह से रिश्ता खत्म होगा तब तो चले जायेंगे लेकिन देहभान का रिश्ता खत्म हो।* तो यह जीवन बहुत प्यारी लगेगी। फिर कोई माया भी आकर्षण नहीं करेगी।

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∫∫ 3 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:- 10)

➢➢ *इस स्वमान का विशेष रूप से अभ्यास किया ?*

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         ❂ *रूहानी ड्रिल प्रति* 
 *अव्यक्त बापदादा की प्रेरणाएं
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✧  तो हे विश्व कल्याणीविश्व परिवर्तक आत्मायें सर्व साधन एवररेडी हैंसर्वशक्तियाँ आपके ऑर्डर में हैंऑर्डर किया अर्थात संकल्प किया- निर्णय शक्तिा तो सेकण्ड से भी कम समय मं निर्णय शक्ति हाजिर हो जाएकहे स्वराज्य अधिकारी हाजिर।

✧  ऐसे ऑर्डर में हैया एक मिनट अपने में लाने में लगेगा फिर दूसरे को दे सकेंगे? *अगर समय पर किसको जो चाहिए वह नहीं दे सके तो क्या होगा?* तो सभी बच्चों के दिल में यह संकल्प तो चल ही रहा है - आगे क्या होना है और क्या करना है?

✧  होना तो बहुत कुछ है। सुनाया ना यह तो रिहर्सल है। यह मास के तैयारी की घण्टी बजी हैघण्टा नहीं बजा है। *पहले घण्टा बजेगाफिर नगाडा बजेगा। डरेंगेथोडा-थोडा डरेंगे?*

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∫∫ 4 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks:- 10)

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर रूहानी ड्रिल का अभ्यास किया ?*

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         ❂ *अशरीरी स्थिति प्रति* 
 *अव्यक्त बापदादा के इशारे* 
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〰✧  *हर वक्त अव्यक्त स्थिति में रहें उसके लिए क्या पुरुषार्थ करना हैसिर्फ एक अक्षर बताओजिस एक अक्षर से अव्यक्त स्थिति रहे।* जितना -जितना अव्यक्त स्थिति में स्थित होंगे - कोई मुख से बोलेन बोले लेकिन उनके अन्दर का भाव पहले से ही जान लेंगे। ऐसा समय आयेगा। इसलिए यह प्रैक्टिस कराते हैं। *अपने को मेहमान समझना। अगर मेहमान समझेंगे तो फिर जो अन्तिम सम्पूर्ण स्थिति का वर्णन है वह इस मेहमान बनने से होगी।* अपने को मेहमान समझेंगे तो फिर व्यक्त में होते हुए भी अव्यक्त में रहेंगे। *मेहमान का किसके साथ भी लगाव नहीं होता है,* हम इस शरीर में भी मेहमान हैंइस पुरानी दुनिया में भी मेहमान हैं। *जब शरीर में ही मेहमान हैं तो शरीर से भी क्या लगन रखें। सिर्फ थोड़े समय के लिए यह शरीर काम में लाना है।*

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∫∫ 5 ∫∫ अशरीरी स्थिति (Marks:- 10)

➢➢ *इन महावाक्यों को आधार बनाकर अशरीरी अवस्था का अनुभव किया ?*

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∫∫ 6 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)
( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

✺   *"ड्रिल :- बुद्धियोग इस दुनिया से निकाल नई दुनिया में लगाना"*

 _ ➳ *मैं आत्मा पतंग अपना डोर मीठे बाबा के हाथों में देकर बेफिक्र होकर आसमान में उड़ रही हूँ... जब से मीठे बाबा के हाथों में अपना डोर थमाया है मैं आत्मा सर्व बन्धनों से न्यारी और प्यारे बाबा की प्यारी बन गई हूँ...* इस पुरानी दुनिया से अपने सारे बंधनदेहधारियों के हाथों में फंसे सारे मोह रूपी डोर तोडकर बंधनमुक्त होकर... ऊपर उड़ते हुए प्यारे बाबा के पास प्यारे वतन में पहुँच जाती हूँ...

   *संगमयुग के पुरुषार्थ से नई दुनिया में राजाई पद पाने का ज्ञान देते हुए प्यारे बाबा कहते हैं:-* मेरे मीठे फूल बच्चे... *अब इस दुनिया का अंत बहुत करीब है... इस खत्म हुई सी दुनिया से मन बुद्धि को निकाल मीठे बाबा की मीठी यादो में लगाओ...* इस वरदानी संगमयुग में ये मीठी यादे सतयुगी सुखो से दामन सजायेंगी... और सुखो भरी राजाई दिलाएंगी...

 _ ➳  *अब घर जाना है की स्मृति से एक बाबा की यादों में समाकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे प्यारे बाबा... *मै आत्मा इस दुखो से भरी दुनिया से न्यारी होकर ईश्वरीय यादो में धनवान् बनती जा रही हूँ...* मीठे संगम पर मीठे बाबा संग यादो में झूम रही हूँ और श्रेष्ठ संस्कारो को स्वयं में भरती जा रही हूँ...

   *इस धरा से उठाकर धूल से मस्तक मणि जगमगाता सितारा बनाकर मीठे बाबा कहते हैं:-* मीठे प्यारे लाडले बच्चे... स्वयं को देह समझ देह की मिटटी में मटमैले हो गए हो... खुबसूरत सितारे हो यह पूरी तरह से भूल गए हो... *अब इस खत्म सी खाली दुनिया से और दिल न लगाओ... नई सुखो भरी खुबसूरत दुनिया में चलने के प्रयासों में जुट जाओ...”*

 _ ➳ *नई दुनिया के नजारों को अपनी आँखों में बसाकर स्नेह सागर में डूबकर मैं आत्मा कहती हूँ:-* मेरे प्राणप्रिय बाबा... *मै आत्मा इस दुखदायी दुनिया से उपराम होकर आपकी मीठी यादो में दिव्य गुणो को धारण कर शक्तिशाली बनती जा रही हूँ...*  देवताओ जैसा रूप रंग पाती जा रही हूँ... सुखो भरे स्वर्ग के लायक बनती जा रही हूँ...

   *पुरानी दुनिया के संस्कारों को मिटाकर नई दुनिया में चलने के लिए नए संस्कारों को धारण कराते हुए मेरे बाबा कहते हैं:-* प्यारे सिकीलधे मीठे बच्चे... यह संगमयुग ही सच्ची कमाई का युग है... हर पल हर साँस संकल्प को ईश्वर पिता की यादो में डुबो दो... यह यादे ही सच्ची कमाई बन जाएँगी... *दिव्य गुणो से शक्तियो से सजा कर देवताओ सा सजायेंगी.... और मीठे सुखो और आनन्द से भरपूर दुनिया में राज भाग्य दिलाएंगी...”*

 _ ➳  *स्नेह सागर की यादों में दिव्य गुणों से सजकर बेनूर से कोहिनूर बन मैं आत्मा कहती हूँ:-* हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा संगम युग में पुरानी सी विनाशी दुनिया की हर बात से किनारा कर उज्ज्वल भविष्य की तैयारियों में जुटी हूँ... *सतयुगी दुनिया में ऊँच पद पाकर शान से मुस्कराने के मीठे प्रयत्नों में प्रतिपल जुटी हूँ...”*

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∫∫ 7 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)
( आज की मुरली की मुख्य धारणा पर आधारित... )

✺   *"ड्रिल :- बुद्धि को भटकाना नही है*"

 _ ➳  अपने मन बुद्धि को जैसे ही अपने सुंदर सलौने निराकार भगवान पर एकाग्र करती हूँ मेरे भगवान बाप का मन को लुभाने वाला सुन्दर सलौना स्वरूप आंखों के सामने उभर आता है और उनके इस अति सुंदर विचित्र स्वरूप को निहारते - निहारते मैं एक दम अशरीरी होकर अपने निज स्वरूप में टिक जाती हूँ। *इस देह में होते हुए भी अब मुझे केवल मेरा ज्योति बिंदु स्वरूप ही दिखाई दे रहा है। मेरा यह स्वरूप असीम आनन्दमयी सुकून देने वाला है*। इस स्वरूप में स्थित होते ही मेरे अंदर निहित गुण और शक्तियाँ इमर्ज हो जाती हैं और मुझे मेरे सातों गुणों और अष्ट शक्तियों का सहज अनुभव होने लगता है।

 _ ➳  देख रही हूँ मैं अपने सुखशांतिप्रेमआनन्दपवित्रताज्ञान और शक्ति से सम्पन्न अपने इस स्वरुप को जो मुझे उस सत्यता का बोध करवा रहा है जिस सत्यता से मैं आज दिन तक अनजान थी। *63 जन्मो से स्वयं को देह समझ अपनी बुद्धि को यहाँ - वहाँ भटका कर दुख और निराशा भरा जीवन जी रही थी*। किन्तु अपने इस सत्य स्वरूप का बोध होते ही सारी भटकन समाप्त हो गई। मन उस बिंदु पर एकाग्र हो गया जहाँ गहन शांति ही शांति है। मन मे कोई भटकावकोई उलझन कोई संशय नही। *अपने निज स्वरूप में खो कर हर संकल्पविकल्प से मुक्त एक अति सुन्दर सुखमय स्थिति का मैं अनुभव कर रही हूँ*।

 _ ➳  भृकुटि के अकालतख्त पर विराजमान अपने असीम आनन्दमयी स्वरूप का गहराई तक अनुभव करके अब मैं भृकुटि के अकालतख्त को छोड़ देह से बाहर आ जाती हूँ और अपने विदेही पिता से मिलन मनाने एक खूबसूरत रूहानी यात्रा की ओर चल पड़ती हूँ। *मन को इस अति सुंदर रूहानी यात्रा पर एकाग्र करबुद्धि से इस रूहानी यात्रा के खूबसूरत नज़ारों का आनन्द लेती मैं मन बुद्धि की इस सुंदर यात्रा पर निरन्तर बढ़ती जा रही हूँ*। अपनी मंजिल को स्पष्ट अपने सामने देखती हुई अपने मन बुद्धि को इधर - इधर भटकाये बिना मैं सीधे अपनी मंजिल की ओर जा रही हूँ। कुछ ही पलों की इस रूहानी यात्रा को पूरा कर अब मैं अपनी मंजिल अपने घर शान्तिधाम में पहुँच चुकी हूँ।

 _ ➳  अथाह शांति से भरपूर इस शान्तिधाम घर मे फैले शान्ति के शक्तिशाली वायब्रेशन मुझे उस वास्तविक शांति का अनुभव करवा रहें हैं जिसकी तलाश में मैं आज दिन तक भटक रही थी। *शांति की इस अनोखी जादुई शक्ति का अनुभव करते - करते इस शक्ति के जन्मदाताशांति के सागर अपने शिव पिता के मैं समीप पहुँचती हूँ और अपने मन बुद्धि को पूरी तरह उनके ऊपर एकाग्र कर लेती हूँ*। उनके समीप बैठ उनके सर्व गुणों,सर्व शक्तियों की एक - एक किरण को गहराई तक मैं स्वयं में आत्मसात करती जा रही हूँ। *बाबा के अनन्त गुणअनन्त शक्तियाँ मेरे अंदर समाकर मेरे अंदर निहित गुणों और शक्तियों को कई गुना बढ़ा रहें हैं। सर्वगुणोंसर्वशक्तियों से मैं स्वयं को सम्पन्न अनुभव कर रही हूँ*।

 _ ➳  शक्तिसम्पन्न स्वरूप बन कर अब मै आत्मा फिर से साकार सृष्टि पर अपना पार्ट बजाने के लिए अपनी साकार देह में प्रवेश करती हूँ। और सृष्टि रंगमंच पर अपना हीरो पार्ट बजाने के लिए भृकुटि के अकालतख्त पर फिर से विराजमान हो जाती हूँ। *अपने ब्राह्मण स्वरूप में रहते अब मैं सदैव अपने निराकारी स्वरूप की स्मृति में रहती हूँ*। स्वराज्य अधिकारी की सीट पर सदा सेट रहकर अपनी कर्मेन्द्रियों की मालिक बन अपनी इच्छा से हर कर्मेन्द्रिय को चलाते हुए, *अपने मन बुद्धि को इधर - उधर भटकने से बचा करअपना सम्पूर्ण ध्यान केवल अपने सत्य स्वरूप पर और अपने पिता परमात्मा पर एकाग्र करउनके सानिध्य में रहते हुएउनसे मिलने वाले अतीन्द्रीय सुख का रसपान सदैव करती रहती हूँ*।

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∫∫ 8 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)
( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

✺   *मैं मर्यादा पुरुषोत्तम बन सदा उड़ती कला में उड़ने वाली नम्बरवन विजयी आत्मा हूँ ।*

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?
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∫∫ 9 ∫∫ श्रेष्ठ संकल्पों का अभ्यास (Marks:- 5)
( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

✺   *मैं एक बाप के श्रेष्ठ संग में रहते हुए दूसरे कोई भी संग से प्रभावित नहीं होने वाली  ब्राह्मण आत्मा हूँ  ।*

➢➢ इस संकल्प को आधार बनाकर स्वयं को श्रेष्ठ संकल्पों में स्थित करने का अभ्यास किया ?
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∫∫ 10 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)
( अव्यक्त मुरलियों पर आधारित... )

 अव्यक्त बापदादा :-

 _ ➳  1. बापदादा प्रत्यक्षता वर्ष के पहले इस वर्ष को 'सफलता भव का वर्षकहते हैं। *सफलता का आधार हर खजाने को सफल करना। सफल करोसफलता प्राप्त करो। सफलता प्रत्यक्षता को स्वतः ही प्रत्यक्ष करेगी।* वाचा की सेवा बहुत अच्छी की लेकिन *अब सफलता के वरदान द्वारा बाप कीस्वयं की प्रत्यक्षता को समीप लाओ। हर एक ब्राह्मणों की जीवन में सर्व खजानों की सम्पन्नता का आत्माओं को अनुभव हो।* आजकल की आत्मायें आपके अनुभवी मूर्त द्वारा अनुभूति करने चाहती है। सुनने कम चाहती हैंअनुभूति ज्यादा चाहती हैं। *'अनुभूति का आधार है - खजानों का जमा खाता'।* अभी सारे दिन में बीच-बीच में यह अपना चार्ट चेक करोसर्व खजाने जमा कितने किये? *जमा का खाता निकालोपोतामेल निकालो।* एक मिनट में कितने संकल्प चलते हैंसंकल्प की फास्ट गति है ना। कितने सफल हुएकितने व्यर्थ हुएकितने समर्थ रहेकितने साधारण रहे?

 _ ➳  2. *अब ऐसे एवररेडी बनो जो हर संकल्पहर सेकण्डहर श्वांस जो बीते वह वाहवाह हो।* व्हाई नहीं होवाहवाह हो। अभी कोई समय वाह-वाह होता हैकोई समय वाह के बजाए व्हाई हो जाता है। कोई समय बिन्दी लगाते हैंकोई समय क्वेश्चन मार्क और आश्चर्य की मात्रा लग जाती है। *आप सबका मन भी कहे वाह! और जिसके भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आते होचाहे ब्राह्मणों केचाहे सेवा करने वालों के वाह! वाह! शब्द निकले। अच्छा।*

✺   *ड्रिल :-  "सर्व खजानों को सफल करने का अनुभव"*

 _ ➳  *पीस पार्क में बाबा की याद की छत्रछाया में बैठी मैं पीसफुल आत्मा बड़ी गहराई से बाबा के महावाक्यों पर मनन कर रही हूँ...* मैं पीसफुल आत्मा मनन की लगन में एक मगन अवस्था में स्थित हूँ... ज्ञान की एक-एक प्वाइंट पर बड़ी गहराई से मंथन कर रही हूँ... बाबा के कहे महावाक्य मन रुपी स्लेट पर प्रत्यक्ष हो रहे है... *"सफलता का आधार हर खजाने को सफल करना। सफल करोसफलता प्राप्त करो"* मैं आत्मा बाबा से मिले सर्व अखूट खजानों को सामने लाती हूँ... *वाह बाबा वाह कितने सारे अखूट अविनाशी खजाने बाबा ने मुझ आत्मा को दिए है...* एक-एक खजाना अविनाशी है... *जितना बांटो उतना ही बढ़ता जाता है...*

 _ ➳  वाह कितने अखूट खजाने बाबा ने मुझ आत्मा को दिए है... *जिन्हें मुझ से कोई छीन नहीं सकता जो कभी खुटते नहीं है... मैं सर्व खजानों की मालिक आत्मा हूँ...* तभी मुझ आत्मा के कानों में बाबा के कहे महावाक्य गूंजने लगते है... *"सफलता का आधार हर खजाने को सफल करना"* तभी मैं आत्मा अन्तर्मन से प्रश्न करती हूँ... क्या मैं आत्मा बाबा से मिले हर खजाने को सफल कर हमेशा सफलता प्राप्त कर रही हूं ? *मैं आत्मा स्व चेकिंग करती हूँ... सारे दिन मेंमैं आत्मा कितने खजाने जमा कर रही हूँ... कहीं कोई खजाना व्यर्थ तो नहीं जा रहा है ?* मैं आत्मा अपना पोतामेल निकाल रही हूँ... और अब मैं आत्मा देख रही हूँ स्वयं को मधुबन पांड़व भवन बाबा की कुटिया में...

 _ ➳  *सम्मुख ब्रह्मा बाबा और उनकी भृकुटि में शिव बाबा चमक रहे है... मैं आत्मा सच्चाई से बाबा को अपना खजानों के जमा खाते का पोतामेल दे रही हूँ...* बापदादा मुझे दृष्टि दे रहे है... बाबा की दृष्टि से निकलती शक्तिशाली अविरल धाराएं मुझ आत्मा में समा रही है... *बाबा ने अपना वरदानी हाथ मुझ आत्मा के सिर पर रख दिया है... बाबा मुझे "सफलतामूर्त भव" का वरदान दे रहे है... मैं आत्मा अन्तर्मन से इस वरदान को स्वीकार कर रही हूँ...* बाबा सर्व शक्तियों से मुझ आत्मा को भरपूर रहे है... *मैं आत्मा बेहद शक्तिशाली स्थिति का अनुभव कर रही हूँ...* और बहुत हल्का फील कर रही हूँ...

 _ ➳  सर्व शक्तियों और वरदानों से भरपूर हो *मैं आत्मा अब देख रही हूँ... स्वयं को कर्मक्षेत्र पर शिव बाबा की याद में कर्म करते हुए... अब मैं आत्मा बाबा से मिले हर खजाने को सफल कर रही हूँ... और निरंतर सफलता प्राप्त कर रही हूँ...* मैं आत्मा एवररेडी बन हर संकल्पहर सेकंडहर श्वांस को मैं आत्मा सफल करवाह वाह कर रही हूँ... सफलता प्राप्त कर रही हूँ... *बाबा से मिला सफलता भव का वरदान प्रत्यक्ष हो रहा है... मैं आत्मा जिन भी आत्माओं के सम्पर्क में आ रही हूँ... वे सभी आत्माएँ मुझ आत्मा से सर्व खजानों की सम्पन्नता का अनुभव कर रही है...*

 _ ➳  मैं आत्मा खजानों की मालिक खजानों से मालामाल आत्मा, *सभी आत्माओं को भी खजानों से मालामाल सम्पन्न बना रही हूँ... वे सभी भी वाह वाह के गीत गा रहे है... सभी सम्बन्ध-सम्पर्क में आने वाली आत्माएँ सन्तुष्ट हो रही है...* हर खजाने को सफल कर मैं आत्मा सफलता प्राप्त कर बाप की प्रत्यक्षता को समीप ला रही हूँ... *सफलता प्रत्यक्षता को स्वतः ही प्रत्यक्ष कर रही है... शुक्रिया मीठे बाबा शुक्रिया...*

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_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

♔ ॐ शांति 
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