❍ ज्ञान
के मुख्य बिंदु ❍
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➢➢ *बिगड़ी को बनाने
वाला भगवान भोलानाथ ही है। वह कल्प-कल्प सर्व की बिगड़ी को बनाने वाला। सर्व को
गति सद्गति देने वाला है।* लौकिक बात टीचर गुरु हमको बेहद का मालिक नहीं बना
सकते ।
➢➢ बाप हमेशा भोले होते हैं *एक होता है हद का बाप दूसरा होता है बेहद का बाप*। बाप तो होते ही हैं - एक अलौकिक और दूसरा पारलौकिक। लौकिक बाप को तो सब जानते ही हैं *तुम ब्राह्मण अलौकिक बाप और पारलौकिक बाप दोनों को जानते हो ।*
➢➢ बाप हमेशा भोले होते हैं *एक होता है हद का बाप दूसरा होता है बेहद का बाप*। बाप तो होते ही हैं - एक अलौकिक और दूसरा पारलौकिक। लौकिक बाप को तो सब जानते ही हैं *तुम ब्राह्मण अलौकिक बाप और पारलौकिक बाप दोनों को जानते हो ।*
➢➢ *स्वर्ग में तो सब नहीं जा सकते। बाप कहते हैं सर्व की सद्गति करता हूं।* तुम मुक्ति में जाकर फिर पार्ट बजाने आते हो नंबरवार । *मुक्ति सबको मिलती है।* माया के दुख से सब छूट सकते हैं। फिर नंबरबार आना होगा पार्ट बजाने ।
➢➢ *फूलों का बगीचा स्थापन होता है संगम पर। संगम को तुम ब्राह्मण ही जानते हो ।*
➢➢ *रावण की मशीनरी है पावन को पतित बनाना। राम की मशीनरी है पतितों को पावन बनाना।*
➢➢ *जो धारण करते और कराते हैं वही ऊंच पद पाते हैं। धारणा नहीं करेंगे तो ऊँच पद भी कम हो जायेगा।*
➢➢ *तुम्हारा बोल जो निकलता है उनको रत्न कहा जाता है। बाप रूप-बसन्त है । आत्मा को रूपवान बनाते है ।*
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❍ योग
के मुख्य बिंदु ❍
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➢➢ *अब बाप कहते
हैं कि दे दान तो छुटे ग्रहण। योगबल से माया रावण को जीतना है ।* विकारों का
दान दिया जाता है तो ग्रहण छूट जाता है ।
➢➢ *मुख्य है यही योग बापदादा जिससे स्वर्ग की बादशाही का वरसा मिलता है उनको याद भला क्यों नहीं करेंगे*। सारा कल्प तो देहधारी को याद किया है *अब याद करना है विदेही को, विचित्र को ।*
➢➢ *अब आत्मा काली कुरूप है उनको योग से रूपवान बनाना है ।*
➢➢ अब बाप कहते है मैंने तुमकों कितना समझदार बनाया था। तुमको *स्वर्ग में भेजा था फिर तुम 84 जन्म लेते-लेते क्या बन पड़े हो। अनेक बार यह चक्र लगाया हैं।*
➢➢ *मुख्य है यही योग बापदादा जिससे स्वर्ग की बादशाही का वरसा मिलता है उनको याद भला क्यों नहीं करेंगे*। सारा कल्प तो देहधारी को याद किया है *अब याद करना है विदेही को, विचित्र को ।*
➢➢ *अब आत्मा काली कुरूप है उनको योग से रूपवान बनाना है ।*
➢➢ अब बाप कहते है मैंने तुमकों कितना समझदार बनाया था। तुमको *स्वर्ग में भेजा था फिर तुम 84 जन्म लेते-लेते क्या बन पड़े हो। अनेक बार यह चक्र लगाया हैं।*
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❍ धारणा
के मुख्य बिंदु ❍
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➢➢
तुम बच्चे अभी रूप-बसंत बनते हो । मुख से सदैव अविनाशी ज्ञान रतन निकलते हैं *बच्चों
के मैनर्स बहुत मीठे होने चाहिए। मुख से हमेशा रतन ही निकलने चाहिए ।*
➢➢ *बच्चों को बुद्धि में बहुत नशा चढ़ना चाहिए कि राजधानी स्थापन हो रही है ।*
➢➢ *अगर कोई उल्टी बात सुनाए तो समझो यह हमारा दुश्मन है । ऐसे का संग कभी नहीं करना, ना सुनना ।*
➢➢ *आपेही अपना कल्याण करना है । किसकी गलानी नहीं करनी है ।*
➢➢ बाप कहते है तुम सब आत्माएं मेरे बच्चे हो। भाई-बहन हो। *बुद्धि में यह आना चाहिए। बाप स्वर्ग रचने वाला है। तो हमको स्वर्ग की राजाई क्यों नहीं मिलनी चाहिए ।*
➢➢ *बच्चों को बुद्धि में बहुत नशा चढ़ना चाहिए कि राजधानी स्थापन हो रही है ।*
➢➢ *अगर कोई उल्टी बात सुनाए तो समझो यह हमारा दुश्मन है । ऐसे का संग कभी नहीं करना, ना सुनना ।*
➢➢ *आपेही अपना कल्याण करना है । किसकी गलानी नहीं करनी है ।*
➢➢ बाप कहते है तुम सब आत्माएं मेरे बच्चे हो। भाई-बहन हो। *बुद्धि में यह आना चाहिए। बाप स्वर्ग रचने वाला है। तो हमको स्वर्ग की राजाई क्यों नहीं मिलनी चाहिए ।*
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❍ सेवा
के मुख्य बिंदु ❍
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➢➢ बाप समझाते रहते
है। करेक्शन भी करते जाओ। *ब्रह्माकुमार कुमारियों के आगे प्रजापिता ब्रह्मा
जरूर लिखना चाहिए । प्रजापिता कहने से बाप सिद्ध हो जाता है ।* हम प्रश्न ही
पूछते हैं कि प्रजापिता ब्रह्मा से क्या संबंध है ? क्योंकि ब्रह्मा नाम तो
बहुतों के है।
➢➢ *बाप है ज्ञान का सागर। उसका रूप भी समझाया है कि कितना सूक्ष्म है वह तो लिंग कह देते हैं। *पहले तो बाप का परिचय देना है। भल वह ज्योतिर्लिंगम ही समझें। डीप बात बाद में समझानी होती है। फिर पूछना होता है आत्मा का रूप क्या है ?* यह तो सब कहते हैं भृकुटि के बीच में चमकती है। तो जरूर छोटी ही होगी । बड़ा लिंग तो यहां बैठ भी ना सके ।
➢➢ *पहले तो बाप और बच्चे का संबंध बुद्धि में बिठाना चाहिए।* वह तो है बेहद का बाप। अब ब्रह्मा कहाँ से आता है ?
➢➢ बाबा हमेशा समझाते हैं कि *ज्ञान रत्न दान करते रहो। बाबा जो सुनाते हैं वह औरों को सुनाओ।*
➢➢ *बाप काटों से फूल बनाने आये है तो बच्चों का भी यही धन्धा है।* बाप यह धंधा सिखलाते हैं। तो यह मनुष्य को देवता, कांटों को फूल बनाने की फैक्ट्री हुई ना। *तुम्हारा ज्ञान मेटेरियल है जिससे तुम मनुष्य से देवता बनते हो। तो वह हुनर सीखना चाहिए ना बिगड़ी को बनाते रहो पत्थर-बुद्धि को पारसबुद्धि बनाओ।*
➢➢ *बाप है ज्ञान का सागर। उसका रूप भी समझाया है कि कितना सूक्ष्म है वह तो लिंग कह देते हैं। *पहले तो बाप का परिचय देना है। भल वह ज्योतिर्लिंगम ही समझें। डीप बात बाद में समझानी होती है। फिर पूछना होता है आत्मा का रूप क्या है ?* यह तो सब कहते हैं भृकुटि के बीच में चमकती है। तो जरूर छोटी ही होगी । बड़ा लिंग तो यहां बैठ भी ना सके ।
➢➢ *पहले तो बाप और बच्चे का संबंध बुद्धि में बिठाना चाहिए।* वह तो है बेहद का बाप। अब ब्रह्मा कहाँ से आता है ?
➢➢ बाबा हमेशा समझाते हैं कि *ज्ञान रत्न दान करते रहो। बाबा जो सुनाते हैं वह औरों को सुनाओ।*
➢➢ *बाप काटों से फूल बनाने आये है तो बच्चों का भी यही धन्धा है।* बाप यह धंधा सिखलाते हैं। तो यह मनुष्य को देवता, कांटों को फूल बनाने की फैक्ट्री हुई ना। *तुम्हारा ज्ञान मेटेरियल है जिससे तुम मनुष्य से देवता बनते हो। तो वह हुनर सीखना चाहिए ना बिगड़ी को बनाते रहो पत्थर-बुद्धि को पारसबुद्धि बनाओ।*
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