13 /05/17 की मुरली से चार्ट MARKS:- 100

 ∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 3*5=15) 
➢➢ *बाप की जो सेवा ले रहे हैं, उसका दिल से रीटर्न दिया ?*

➢➢ *शिवबाबा के गले का हार बनने के लिए रेस की ?*

➢➢ *"देह भी याद न पड़े" - इसका अभ्यास किया ?*

∫∫ 2 ∫∫ विशेष अभ्यास (Marks:2*10=20)


➢➢ *परमात्म चिंतन के आधार पर सदा बेफिक्र रह निश्चयबुधी निश्चिंत स्थिति का अनुभव किया ?*

➢➢ *सबकी दुआएं प्राप्त कर सदा संतुष्टता का अनुभव किया ?*

∫∫ 3 ∫∫ विशेष पुरुषार्थ (Marks: 15)
( इस रविवार की अव्यक्त मुरली से... )

➢➢ *"सेकण्ड में सूक्ष्मवतन वासी, सेकण्ड में मूलवतनवासी, सेकण्ड में साकार वतन वासी होने का अनुभव किया ? 

∫∫ 4 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)
( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

➢➢  *"मीठे बच्चे - श्रीमत में कभी मनमत मिक्स नही करना, मनमत पर चलना माना अपनी तकदीर को लकीर लगाना"*

   *प्यारे बाबा :-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... जिस भगवान के दर्शन मात्र को तरसते थे,आज वह प्यारा बाबा सम्मुख बैठ बात कर रहा है... श्रीमत देकर... विकारो के संग में कांटे हो चले, फूलो को फिर से खिला रहा है... तो *परमात्म मत को सदा दिल में समाये हुए*... असीम खुशियो में मौज मनाते रहो... श्रीमत के हाथ को थाम सदा अपार ख़ुशी में रहो...

_   *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपको पाकर किस कदर खुशनसीब हो गयी हूँ... प्यारे बाबा *हर कदम आपकी राय पर चलने वाली, मै आत्मा ईश्वरीय दिल की धड़कन हो गयी हूँ.*.. मनुष्य मतो से मुक्त होकर, ईश्वरीय प्यार में खिल कर दिव्य फूल हो गयी हूँ..."

   *मीठे बाबा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... ईश्वर पिता की श्रीमत पर चलकर, दिव्य तेज से दमक कर, देवताई सुखो के सरताज बन मुस्कराओ... *सच्चे पिता का हाथ थाम, सच की राहो पर बेफिक्री से इठलाओ.*.. श्रीमत में कभी भी मनमत मिक्स न करो... ईश्वरीय मत पर चल, सदा निश्चिन्त हो, खुशियो भरे गीत गाओ...."

_   *मैं आत्मा :-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मैं आत्मा आपके प्यार की छत्रछाया में सदा की सुखी हो गयी हूँ... ईश्वरीय मत पर चलकर जीवन कितना प्यारा और सुखद हो चला है... *प्यारे बाबा आपके साथ ने हर पल को खुबसूरत बना दिया है.*. और मै आत्मा संगम युगी जीवन का पूर्णतया आनन्द ले रही हूँ..."

   *प्यारे बाबा :-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... *श्रीमत से ही सच्चे सुखो को पाने वाले, देवता बनकर सतयुगी वैभव को गले लगायेंगे.*.. यह श्रीमत ही जीवन को नये आयामो से सजाकर,अनन्त प्राप्तियों से भरपूर बनाएगी... इसलिए श्रीमत में कभी भी मनमत मिलाकर, अपनी खुबसूरत तकदीर को लकीर नही लगाओ...सदा श्रीमत पर ही चलो..."

_   *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा मनमत पर चलकर दुखो के जंगल में भटक गयी थी... तनमन लहूलुहान सा हो चला था... आपने *मीठे बाबा मुझे अपनी गोद में बिठाकर कितना सुख, कितना आराम दिया है.*.. प्यार के फूलो भरे मखमल को बिछा कर मेरी तपन को सदा का सुकून दिया है...

∫∫ 5 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)
( आज की मुरली की धारणा पर आधारित... )

   *"ड्रिल :- आज की मुरली से बाबा की 4 निमनलिखित शिक्षाओं की धारणा के लिए विशेष योग अभ्यास*"
             *निरहंकारी बन सेवा करना*
             *बहुत मीठा बनना*
             *समय को व्यर्थ नही गंवाना*
             *शिव बाबा के गले का हार बनना*

_   अंतर्मुखता की गुफा में बैठ एकांतवासी बन मैं अपने मन बुद्धि को एकाग्र करती हूं केवल एक परमपिता परमात्मा पर और एक के अंत में खो जाती हूं। *परमधाम निवासी परमपिता परमात्मा शिव बाबा के साथ बुद्धि की तार जुड़ते ही मैं एक गहन शांत चित स्थिति में स्थित हो जाती हूँ*। इसी शांत चित स्थिति में मैं अनुभव कर रही हूं कि मैं आत्मा इस  साकारी देह से बिल्कुल डिटैच हूँ।

_   अशरीरीपन की स्थिति में स्थित होकर मैं पहुंच जाती हूं आत्माओं की एक ऐसी निराकारी दुनिया में जहां चारों ओर जगमग करती हुई निराकारी आत्माएं ही आत्माएं दिखाई दे रही है। देह और देह से जुड़े किसी भी पदार्थ का यहां संकल्प मात्र भी नहीं। *एक बहुत ही न्यारी और प्यारी साक्षी स्थिति में मैं आत्मा स्वयं को अनुभव कर रही हूं*। एक आलौकिक सुखमय स्थिति में मैं सहज ही स्थित होती जा रही हूं।

_   निर्संकल्प स्थिति में स्थित होकर मास्टर बीज रुप बन अपने बीज रुप परम पिता परमात्मा शिव बाबा को मैं निहार रही हूं। *बिंदु बन बिंदु बाप के साथ मिलन बनाने का यह सुख परम आनंद देने वाला है। बीज रुप परम पिता परमात्मा शिव बाबा से शक्तिशाली प्रकंपन निकल निकल कर चारों ओर फ़ैल रहे हैं*। सर्व शक्तियों, सर्व गुणों रुपी किरणों की मीठी मीठी फुहारे उन से निकल कर मुझ आत्मा पर पड़ रही है और मुझे असीम बल प्रदान कर रही हैं। परमात्म शक्तियों से मैं आत्मा भरपूर होती जा रही हूं और बहुत ही शक्तिशाली स्थिति का अनुभव कर रही हूं। *सर्वशक्तियों से भरपूर हो कर अब मैं आत्मा वापिस लौट आती हूं साकारी दुनिया में और अपने पांच तत्वों के बने शरीर में प्रवेश कर जाती हूं* इस स्मृति के साथ कि ईश्वरीय सेवा अर्थ मैं इस धरा पर आई हूँ।

_   इसलिए बाप समान निरहंकारी बन मुझे ईश्वरीय सेवा पर सदा तत्पर रहना है। जैसे करनकरावन हार बाबा निरहंकारी हैं। सब कुछ करते भी स्वयं गुप्त रह कर हम बच्चों को आगे करते है ऐसे *बाप समान निरहंकारी बन बाबा के कार्य में सहयोगी बन मुझे बाबा की सेवा का दिल से रिटर्न देना है*। इसलिए मैं बाबा से और स्वयं से प्रोमिस करती हूँ कि बाबा के गुणों को स्वयं में धारण कर मैं बाप समान बहुत बहुत मीठा बन सर्व आत्माओं को सुख देने के निमित्त अवश्य बनूँगी।

_   "अब नही तो कब नही" इस स्लोगन को सदा स्मृति में रखते हुए संगमयुग के मोस्ट वैल्युबुल समय को अब मैं चलते - फिरते व्यर्थ नही गंवाऊंगी। बल्कि *संगमयुग के हर सेकण्ड को परमात्म याद और परमात्म सेवा में रहकर सफल करुँगी*। शिवबाबा के गले का हार बनने के लिए अन्य ब्राह्मण आत्माओं से रीस करने के बजाए रेस करते हुए लास्ट सो फ़ास्ट, फ़ास्ट सो फर्स्ट बन कर दिखाऊंगी। *बाबा की श्रीमत पर चल कर अपना और सर्व आत्माओं का कल्याण करना ही अब मेरे इस ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य है* । इस स्मृति में स्थित हो कर देह में रहते भी देह से न्यारे हो कर रहने का दिव्य अलौकिक आनन्द मैं अनुभव कर रही हूँ ।

_   इस दिव्य आलौकिक आनन्द की अनुभूति को निरन्तर बढ़ाने के लिए मैं अपने आप से प्रोमिस करती हूँ कि अपनी बुद्धि को अब देह और देह के सम्बन्धों में कभी भी अटकाना नही है । *इस बात को अब मुझे सदैव स्मृति में रखना है कि वास्तव में तो मैं यहां केवल एक मेहमान हूँ और परमपिता परमात्मा बाप के कार्य में सहयोगी बनने के लिए इस दुनिया में अवतरित हुई हूँ*। कार्य सिद्ध कर अपने प्यारे परम पिता परमात्मा बाप के साथ मुझे वापिस अपने घर मूलवतन जाना है । इसलिए यह देह याद ना पड़े अब केवल मुझे यही अभ्यास पक्का करना है।

∫∫ 6 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:-10)
( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

   *"ड्रिल :- मैं आत्मा निश्चयबुद्धि निश्चिंत हूँ ।*"

_   परमात्म प्यार में पलने वाली मैं अति सौभाग्यशाली आत्मा... इस संगमयुग पर अपना अंतिम जन्म बाबा की सेवा में... बेहद की सेवा में... लगा रही हूँ... मन वचन कर्म वाणी से... पूर्णतः समर्पित मैं आत्मा बैठी हूँ बाबा के कमरे में... अपने आप को बाबा को सौंप कर मन ही मन बोल रही हूँ *"बाबा मैं तेरी हूँ... तूने संभाला अपना बनाया... आगे भी तू ही संभालना... तू जैसा चाहे वैसा रख... हड्डी हड्डी भी तेरी सेवा में समर्पित कर दूँगी"*

_   बाबा से रूहरिहान करती मैं आत्मा अपने आप को देख रही हूँ... अलौकिक ब्राह्मण जन्म के पहले वाला जन्म और अभी का यह संगमयुगी ब्राह्मण ... परमात्म स्नेही जन्म... कितना अंतर दिखाई दे रहा है... अपना स्वरुप... कार्य शैली... जीवन पद्धति... संकल्प शक्ति क्या थी अभी क्या हो गई है... बाबा ने हाथ जो पकड़ लिया... *एक तरफ पूरी विकारी दुनिया और दूसरी तरफ मेरा हाथ पकडे बापदादा खड़े हैं... भक्ति मार्ग में अकेली खड़ी थी अभी संगमयुग पर बापदादा साथ खड़े हैं...*

_   अपने आप को बापदादा के छत्रछाया में सुरक्षित महसूस करती मैं आत्मा... *निश्चयबुद्धि विजयन्ती भव् का वरदानी तिलक बापदादा द्वारा लगाया हुआ स्पष्ट देख रही हूँ... दुनिया वालों के हर कदम में चिंता... दुःख... हताशा...निराशा है पर मेरे कदमों में पदमों की कमाई जमा हो रही है...* श्वांसोश्वांस बाबा को समर्पित... हर बोल... हर संकल्प में परमात्म चिंतन मुझे निश्चिन्त... बेफिक्र बना रहा है...

_   *मैं बिंदी...बाबा बिंदी... यह ड्रामा भी बिंदी... तीनो बिंदी का तिलक लगाए... अमृतवेला से ही तितली की भांति लौकिक के हर कार्य मैं आत्मा ट्रस्टी बन कर रही हूँ...* संगमयुग... कल्याणकारी युग जिसमें स्वयं भगवान आकर अपने बच्चों से मिलते हैं... मैं आत्मा... खुशनसीब हूँ जिसे संगम पर भगवान मिले... भगवान की छत्रछाया... पालना मिली...

_   *"मैं और मेरा" बंधनों के जंजीरों में बंधी मैं आत्मा अपने आप को सिर्फ  निमित्त बनाकर हर कार्य सफल कर रही हूँ...* बाबा से आती हुई सर्व शक्तियों के अखूट खजानों को संपूर्ण रूप से अपने में धारण कर... स्वमान में स्थित हो कर... हर कार्य... बापदादा का कार्य समझ के कर रही हूँ... बापदादा के कंबाइंड स्वरुप को हर घड़ी हर पल अपने साथ महसूस करती मैं आत्मा गुनगुनाती रहती हूँ "तुम तो यही कहे बाबा मेरे आसपास हो ... आते नजर नहीं फिर भी मेरे साथ साथ हो..." शुक्रिया बाबा संगम पर मुझे अपना बनाने के लिए.. ॐ शांति...
 ∫∫ 7 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks-10)
( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

   *"ड्रिल :- सबकी दुआयें लेते सदा सन्तुष्टता का अनुभव करना"*

_   मन बुद्धि को सभी बाह्य बातों से हटाकर... मैं एकाग्रचित्त होकर भृकुटि के मध्य में... मैं आत्मा देखती हूँ अपने चैतन्य दिव्य ज्योति स्वरूप को... एक चमकता हुआ सितारा... यह मैं आत्मा हूँ... मैं अपना वास्तविक स्वरूप देख रही हूँ... आकाश में चमकते हुए सितारे में से... जैसे किरणे निकलती है ऐसे *मुझ आत्मा रूपी सितारें में से... शांति, प्रेम, आनन्द, सुख, पवित्रता, ज्ञान... और शक्ति की सतरंगी किरणे निकल रही है*...

_   कुछ क्षणों के लिए मैं खो जाती हूँ... अपने इस सुखमय दिव्य स्वरूप में... बड़े प्यार से *मैं अपने इस स्वरूप को निहारती हूँ... और देख रही हूँ कि कितना शुद्ध... और कितना शक्तिशाली मेरा स्वरूप है*... आज दिन तक अपने इस सुखमय स्वरूप से मैं अनभिज्ञ थी... शुक्रिया मेरे प्यारे मीठे बाबा का... जिन्होंने मुझे मेरे इस सत्य स्वरूप की पहचान करवाई...

_   अपने सत्य वास्तविक स्वरूप का अनुभव करते-करते... *मैं आत्मा खो जाती हूँ... मुझे मेरा वास्तविक परिचय करवाने वाले मीठे बाबा की यादों में*... और स्वयं को मैं परमधाम में... अपने प्यारे शिव पिता के सम्मुख पाती हूँ... मेरे पिता मेरे ही समान ज्योति बिंदु... गुणों शक्तियों में सिंधु के समान है... उनकी सर्वशक्तियाँ रूपी किरणें मेरे चारों और सुरक्षा का दायरा बनाए हुए है...

_   कभी स्वयं को देखती हूँ कभी सर्व शक्तियों के दाता शिव पिता को देखती हूँ... *कितना प्यारा ओर लौकिक मिलन है यह... प्यारे परमात्मा के सानिध्य में... मैं स्वयं को धन्य-धन्य अनुभव कर रही हूँ*... परमात्मा का प्यार पाकर... मैं आत्मा सन्तुष्टता का अनुभव कर रही हूँ... सन्तुष्टता के कारण सब गुण मुझमें समाते जा रहें है...

_   सन्तुष्टता की धारणा ही श्रेष्ठ धारणा है... सन्तुष्टता के साथ-साथ सहनशीलता, धैर्यता, मधुरता...सभी गुण आते जा रहे है... यह गुण मुझ आत्मा को सर्व का प्रिय बनाते जा रहे हैं... *मुझ आत्मा का हर्षित चेहरा... दुःखी आत्माओं को... शान्तिधाम वाले प्यारे बाबा की याद दिलाने की... सेवा कर रहा है*... मुझ आत्मा की अचल-अडोल स्थिति को देख आत्माओं में बल भरता जा रहा है... मैं आत्मा शक्तियों से सम्पन्न होकर सर्व की सहयोगी बनती जा रही हूँ... स्नेह के सागर मीठे बाबा से रुहानी स्नेह भरपूर होकर सबको रुहानी स्नेह रुपी रस्सी में बांधकर संगठन में बल भर दुआओं का खाता बढ़ा रही हूँ...

_   सेवेर-सवेरे बाबा से ज्ञान रत्नों की थाली भर करके... मैं आत्मा सर्व आत्माओं को देती जा रही हूं... कुछ भी हो जाए... कोई कुछ भी दे लेकिन मुझ आत्मा को दुआ देनी है... ओर दुआ लेनी है... *स्वयं के दिल की सन्तुष्टता का फल है ही... सर्व की सन्तुष्टता*... सर्व की दुआओं को प्राप्त करने वाली अनुभवी आत्मा हूँ... अब मैं आत्मा हद की इच्छाओं को छोड बेहद की सेवा कर सर्व की दुआएँ प्राप्त करती जा रही हूं... जिसे बाबा देख मुझ आत्मा के माथे पर हाथ रख आशीर्वाद दे रहें है... अर्थात हमको बाप ने पसन्द कर लिया... शुक्रिया बाबा शुक्रिया...

 ∫∫ 8 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)
( इस रविवार की अव्यक्त मुरली पर आधारित... )

अव्यक्त बापदादा :-

_     *तीसरी अनुभूति- ऐसी समान आत्मा अर्थात् एवररेडी आत्मा - साकारी दुनिया और साकारी शरीर में होते हुए भी बुद्धियोग की शक्ति द्वारा सदा ऐसा अनुभव करेगी कि मैं आत्मा चाहे सूक्ष्मवतन में, चाहे मूलवतन में, वहाँ ही बाप के साथ रहती हूँ। सेकण्ड में सूक्ष्मवतन वासी, सेकण्ड में मूलवतनवासी, सेकण्ड में साकार वतन वासी हो कर्मयोगी बन कर्म का पार्ट बजाने वाली हूँ लेकिन अनेक बार अपने को बाप के साथ सूक्ष्मवतन और मूलवतन में रहने का अनुभव करेंगे।* फुर्सत मिली और सूक्ष्मवतन व मूलवतन में चले गये। ऐसे सूक्ष्मवतन वासी, मूलवतनवासी की अनुभूति करेंगे जैसे कार्य से फुर्सत मिलने के बाद घर में चले जाते हैं। दफ्तर का काम पूरा किया तो घर में जायेंगे वा दफ्तर में ही बैठे रहेंगे! ऐसे एवररेडी आत्मा बार-बार अपने को अपने घर के निवासी अनुभव करेंगी। जैसे कि घर सामने खड़ा है। अभी-अभी यहाँ, अभी-अभी वहाँ। साकारी वतन के कमरे से निकल मूलवतन के कमरे में चले गये।

   *"ड्रिल :-  सेकण्ड में सूक्ष्मवतन वासी, सेकण्ड में मूलवतनवासी, सेकण्ड में साकार वतन वासी होने का अनुभव करना”*

_    *“बाबा बुला रहे हैं बच्चों वतन में आओ, अब मुझको न बुलाओ तुम मेरे पास आओ”... ये गीत सुनते ही मैं आत्मा ऊपर खींची चली जा रही हूँ...* प्यारे बाबा दोनों हाथों को फैलाए मुझे वतन में बुला रहे हैं... मन-बुद्धि के तार बाबा से जुड़ते ही मुझ आत्मा का स्थूल शरीर गायब हो रहा है... मैं आत्मा सूक्ष्म शरीर धारण कर पहुँच जाती हूँ सूक्ष्म वतन... जहाँ ब्रह्मा बाबा के तन में शिव बाबा ऐसे लग रहे हैं जैसे हीरे की डिब्बी में हीरा चमक रहा हो...   

_   *सुप्रीम हीरे से दिव्य किरणों की बौछारें मुझ पर पड़ रही हैं... एक-एक किरण मुझ आत्मा के एक-एक विकार को भस्म कर रहा है...* सभी अवगुणों, कमी-कमजोरियों, विकारों से मुक्त होकर मैं आत्मा हलकी हो रही हूँ... फरिश्ते समान डबल लाइट हो गई हूँ... मैं आत्मा बेदाग हीरा बन रही हूँ...

_   अब मैं आत्मा सूक्ष्म वतन से भी ऊपर उड रही हूँ... फरिश्ते का ड्रेस लोप हो रहा है... मैं आत्मा धीरे-धीरे बिंदु बन रही हूँ... बिंदु बन मैं आत्मा बिंदु बाबा के साथ ऊपर उड़ते हुए मूलवतन पहुँच जाती हूँ... सुप्रीम बिंदु से एक हो जाती हूँ... एक होते ही बाबा से गुण, शक्तियां मुझमें ट्रान्सफर हो रही हैं... *मैं आत्मा सर्व प्राप्ति सम्पन्न स्थिति का अनुभव कर रही हूँ...*

_   अब मुझ आत्मा को पूरी सृष्टि ही अपना घर लग रहा है... मैं आत्मा बेहद के घर में रह रही हूँ... मैं आत्मा ऐसा अनुभव कर रही हूँ कि मैं अब तीन कमरे के घर में रह रही हूँ... साकारी वतन के कमरे में कर्मयोगी बन कर्म करती हूँ... फिर सेकंड में सूक्ष्मवतन व मूलवतन के कमरे में चले जाती हूँ... *मैं आत्मा हर कर्म बाबा के साथ से करती हूँ फिर बाबा के साथ अपने वतन पहुँच जाती हूँ...*

_   अब मैं आत्मा अपने घर जाने के लिए सदा एवररेडी रहती हूँ... जब चाहे तब मैं आत्मा अपने बुद्धियोग की शक्ति द्वारा कहीं भी जा सकती हूँ... मैं आत्मा साकार वतन में सिर्फ कर्म करने आती हूँ... यहाँ की किसी वस्तु, व्यक्ति, वैभव में अपना मन नहीं लगाती हूँ... इस देह से भी मैं आत्मा डिटैच रहती हूँ... ये देह सिर्फ कर्म करने का साधन है... *अब मैं आत्मा एवररेडी बन सेकण्ड में सूक्ष्मवतन वासी, सेकण्ड में मूलवतनवासी, सेकण्ड में साकार वतन वासी होने का अनुभव कर रही हूँ...*

_  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।


                                    ♔ ॐ शांति

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