12/05/2017 की मुरली से चार्ट MARKS:- 100

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 3*5=15)

➢➢ *पैसे को हीरा समझ स्वर्ग बनाने की सेवा में लगाया ?*

➢➢ *समय बरबाद तो नहीं किया ?*

➢➢ *शरीर को भूलने का पुरुषार्थ किया ?* 
 

∫∫ 2 ∫∫ विशेष अभ्यास (Marks:2*10=20)

➢➢ *ज्ञान, गुण और शक्तियों रुपी खजाने द्वारा सम्पन्नता का अनुभव कर संपत्तिवान स्थिति का अनुभव किया ?*

➢➢ *सदा मोहब्बत में लवलीन रह मेहनत से दूर रहे ?* 

 

∫∫ 3 ∫∫ विशेष पुरुषार्थ (Marks: 15)
( इस रविवार की अव्यक्त मुरली से... )

➢➢ *"सेवा के विस्तार में सार रूपी बीज की अनुभूति को भूले तो नहीं ?*

 

∫∫ 4 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)
( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

➢➢  *"मीठे बच्चे - अपने इस जीवन को कौड़ी से हीरे जैसा बनाना है,तो समय को सफल करो,अवगुणों को निकालो,खाने पीने सोने में समय बर्बाद मत करो"*

   *प्यारे बाबा :-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... ईश्वर पिता के साथ और प्यार के यह अनमोल पल व्यर्थ में न गंवाओ... ईश्वर पिता की मीठी यादो में देवतायी सौंदर्य और गुणो से भरपूर हो जाओ... हर पल को यादो में सफल कर श्रेष्ठतम भाग्य के अधिकारी बन मुस्कराओ... *संगम के अमूल्य पलो में खुबसूरत भाग्य की तकदीर बना लो*..."

_   *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मै आत्मा संगम के बहुमूल्य समय को पाकर ईश्वरीय यादो में... हर पल देवताई श्रंगार से सज रही हूँ... *प्यारे बाबा आपकी यादो में अपना खुबसूरत भाग्य सजा रही हूँ.*.. अथाह अमीरी और सुखो का रंग अपनी किस्मत की तस्वीर में भर रही हूँ..."

   *मीठे बाबा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे...मीठे बाबा से अतुलनीय खजानो को बाँहों में भरकर 21 जनमो तक *सदा सुखो में मुस्कराने का आधार यही वरदानी संगम के खुबसूरत पल है.*.. दिव्य गुणी और शक्तियो से सम्पन्न बनकर... खुशियो में झूमने का राज इन्ही पलो की ईश्वरीय यादो में समाया है... इस समय को बेपनाह मुहोब्बत में डुबो दो... और स्वयं को सजा लो..."

_   *मैं आत्मा :-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मैं आत्मा आपको पाकर धन्य धन्य हो गयी हूँ... आपकी सारी दौलत को स्वयं में समाकर मालामाल हो रही हूँ... *मीठे बाबा मेरी हर साँस इस अमूल्य कमाई में जुटी है.*.. मै आत्मा पुरानी दुनिया को भूल हर पल सुखो के स्वर्ग में विचरण कर रही हूँ..."

   *प्यारे बाबा :-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे... संगम के सुहावने समय को ईश्वरीय यादो में भिगोकर... अपने महानतम भाग्य की खुबसूरत तस्वीर सजा लो... *सुखो,खुशियो और प्रेम के फूलो से अनोखे भाग्य को महका दो*... मीठे बाबा के प्यार भरी बाँहों में सदा मुस्कराते रहो... पुरानी दुनिया की मिटटी में अब मलिन न बनो... सिर्फ यादो की बहारो में खोये रहो..."

_   *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा आपकी यादो में कौड़ी से हीरे जेसी सज संवर रही हूँ... कभी खाली थकी निस्तेज सी मै आत्मा... *आज पुनः अपने तेजस्वी स्वरूप को पाकर चमकती मणि हो चली हूँ..*. व्यर्थ से परे होकर हर पल मीठी यादो में खोयी...देवताओ सी सुंदर बन रही हूँ..."

 

∫∫ 5 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)
( आज की मुरली की धारणा पर आधारित... )

   *"ड्रिल :- आज की मुरली से बाबा की 4 निमनलिखित शिक्षाओं की धारणा के लिए विशेष योग अभ्यास*"
          ❶   *तन - मन - धन सफल करना*
          ❷   *पैसा व्यर्थ नही गंवाना*
          ❸   *समय बर्बाद नही करना*
          ❹   *शरीर को भूलने का पुरुषार्थ करना*

_   अपना लाइट का सूक्ष्म आकारी शरीर धारण कर मैं इस साकारी देह से बाहर निकलता हूं। देह की दुनिया के सर्व आकर्षणों से मैं स्वयं को मुक्त अनुभव कर रहा हूं। ऐसा लग रहा है जैसे हर बंधन से मैं मुक्त हो चुका हूं। ज्ञान और योग के पंख लगा कर कर मैं फरिश्ता अब धीरे धीरे इस धरती से ऊपर उठ रहा हूँ। *आजाद पंछी की भांति मैं उड़ने लगा हूं। जैसे - जैसे मैं ऊपर उड़ता जा रहा हूं इस दुनिया की हर वस्तु मुझे आकार में बहुत ही छोटी नजर आ रही है*। प्रकृति की किसी भी हल चल का अब मुझ पर कोई भी प्रभाव दिखाई नही दे रहा। ऊंचे ऊंचे पहाड़ों, नदियों और समुद्र को भी मै सहज रीति पार करता हुआ ऊपर की ओर ही उड़ता चला जा रहा हूं। *उड़ते-उड़ते अब मैं आकाश को भी पार कर जाता हूं और आवाज की दुनिया से भी पार एक खूबसूरत दिव्य लोक में पहुंच जाता हूं*।

_   श्वेत प्रकाश से प्रकाशित यह दुनिया बहुत ही सुंदर दिखाई दे रही है। मेरे बिल्कुल सामने लाइट माइट स्वरूप में ब्रह्मा बाबा और उनकी भृकुटि में शिव बाबा विराजमान है। *एक बहुत ही सुंदर दृश्य मैं अपनी आंखों से देख रहा हूं। फरिश्तों की एक लंबी क्यू लगी है और एक एक करके एक एक फरिश्ता बाप दादा के पास आ रहा है*। बाप दादा हर एक फरिश्ते को आओ मेरे मीठे बच्चे कहकर पहले गले से लगा कर उसे विजय का तिलक देते हैं और फिर उसे शक्तिशाली दृष्टि देते हुए उसे उसकी सेवा बता कर वापिस भेज देते हैं। *मैं देख रहा हूं कि हर फरिश्ता बाबा के पास जाकर उनसे जब दृष्टि लेता है और उनसे आ रही सर्वशक्तियों को जब स्वयं में समाता है तो उसका स्वरूप भी बाप समान दिखाई देने लगता है*।

_   तभी बाबा की दृष्टि मुझ पर पड़ती हैं। बाबा मुझे भी आओ मेरे मीठे बच्चे कहकर पुकारते हैं। विजय का तिलक और मीठी दृष्टि देते हुए मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर अपनी सर्वशक्तियाँ मुझे विल करते हुए बाबा मुझे फरमान करते हैं- " जाओ मेरे मीठे लाडले विश्व कल्याणकारी बच्चे भारत को पावन बनाने का जो बीड़ा बाप ने उठाया है उस कार्य में बाप के मददगार बनो"। *अपना तन - मन - धन सब कुछ भारत को पावन बनाने की सेवा में सफल कर दो। पैसे को व्यर्थ नही गंवाओ बल्कि उसे ईश्वरीय सेवा में लगा कर इन्श्योर कर लो*। पैसे को हीरा स्मझ स्वर्ग बनाने की सेवा में लगाएंगे तो 21 जन्मो के लिये स्वर्ग के वर्से के अधिकारी बन जायेंगे ।

_   भविष्य 21 जन्मो के लिए श्रेष्ठ प्रालब्ध बनाने का समय केवल यही संगम युग ही है। इसलिए संगम युग के इस मोस्ट वैल्युबुल समय को व्यर्थ मत गंवाओ। बल्कि अपनी भविष्य प्रालब्ध ऊंच बनाने के लिए दिन रात कमाई जमा करते जाओ। *बाबा हर रोज मुरली के माध्यम से जो अविनाशी ज्ञान रत्न आपको देते हैं उसे जितना स्वयं धारण कर औरों को कराते जायेंगे उतनी कमाई जमा होती जाएगी*। किन्तु इस अविनाशी कमाई को जमा करने के लिए जरूरी हैं शरीर को भूलने का पुरुषार्थ करना क्योकि जितना इस शरीर को भूल स्वयं को आत्मा समझेंगे उतना सबके प्रति आत्मा भाई भाई का अभ्यास पक्का होने से बेहद की सेवा स्वत: और सहज होने लगेगी।

_   बाबा के हर फरमान का पालन करने के लिए बाप समान सम्पन्न बन *अब मैं फ़रिश्ता अपनी शक्तिशाली किरणे सारे विश्व में फैलाता हुआ लौट आता हूँ साकारी दुनिया में* और ब्राह्मण तन में विराजमान हो कर अपने तन-मन-धन को सफल करने की दृढ प्रतिज्ञा कर ईश्वरीय सेवा पर चल पड़ता हूँ।

 

∫∫ 6 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:-10)
( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

   *"ड्रिल :- मैं आत्मा सम्पत्तिवान हूँ ।"*

_   मधुबन... शांतिवन... एक ऐसी अलौकिक भूमि जहाँ स्वयं भगवान दूरदेश से अपना धाम छोड़ कर अपने बच्चों को मिलने आते हैं... *एक ऐसी परम पावन भूमि जहाँ स्वयं निराकार भगवान... शिव परमात्मा संगम पर साकार में अवतरित हो कर के अपनी स्नेहभरी... प्यार मुरली द्वारा हम बच्चों को सर्वशक्तियों से भरपूर करते हैं...*

_   मैं आत्मा इस संगमयुग में... ब्राह्मण तन में... मस्तकमणि बनकर विराजमान हूँ... *परमपिता परमात्मा से साकार में मिलन मनाने पहुँचती हूँ मधुबन... मधुबन की पवित्र भूमि में पैर रखते ही मेरे नैन अश्रु से भर जाते हैं...* ऐसा अहसास हो रहा है मानो यह तो मेरा ही घर हैं... मैं यहाँ की ही रहनेवाली हूँ...

_   कल्प की बिछुड़ी हुई मैं आत्मा... जिस दिन का इंतजार कर रही थी... *वह पावन दिन आ गया और मैं आत्मा... अपनी स्थिति बनाते बैठी हूँ डायमंड हॉल में... अपने बापदादा के सन्मुख...* सर्व शक्तियों से भरपूर होने... बाबा मुरली चला रहा है और एक अलौकिक दृश्य मुझे दिखा रहा है...

_   *और मैं देख रही हूँ एक विशाल लाल गोले के रूप में एक बड़ी सी ज्योति को... जिस में सभी देवी देवता समाते जा रहे हैं...* और बाबा समझा रहे हैं तू ही तो है वह देवी... जो सोलह कला संपूर्ण... संपूर्ण निर्विकारी... सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली... कल्पवृक्ष की जड़ो में विराजमान...

_   *बाबा मुझे मेरी असली पहचान कराते हैं कि मैं कौन हूँ... कहाँ की रहने वाली हूँ... मेरी शक्तियां... मेरे गुण के स्वदर्शन करा रहे हैं...* मै वह लाल ज्योति को देखती ही रहती हूँ... बाबा मुझ पर अपनी सर्वशक्तियां न्योछावर कर रहे हैं... मैं आत्मा ज्ञान... गुण... शक्तियों से अपने आप को भरपूर कर रही हूँ...

_   मैं आत्मा... अपने आप में संतुष्ट  होती जा रही हूँ... मन की क्षणिक सुख की लालसा... *हद की इच्छाए समाप्त होती जा रही है... हद से निकल कर मुझे बाबा ने बेहद की रहवासी बना दिया...* बाबा ने मुझ आत्मा को सदा संतुष्ट और सम्पन्न बना दिया

_   *यह बाबा के साथ का पहला मिलन मुझ आत्मा को ज्ञान... गुण... शक्तियों रूपी खजानों से सम्पत्तिवान बना गया...* और मैं आत्मा अपने आप को इस अखुट खजानों से भरपूर कर इस अंतिम जन्म को संगमयुग पर सिर्फ और सिर्फ परमात्मा के प्यार में मग्न हो कर मना रही हूँ... और शुक्रिया बाबा शुक्रिया बोलती रहती हूँ... ॐ शांति

 

∫∫ 7 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks-10)
( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

   *"ड्रिल :- मोहब्बत में सदा लवलीन रह मेहनत मुक्त अवस्था का अनुभव"*

_   स्नेह प्यार की तुझसे बाबा बांधी है जीवन डोर... दिल तेरा लगा ही रहता अब तो तेरी ओर... इस *गीत को गुनगुनाते हुए मैं आत्मा सजनी लवलीन ही जाती हूँ... अपने शिव साजन की मोहब्बत में*... अपने प्रभु राम के प्यार में खोई... मैं आत्मा सीता विचार करती हूँ... कि जब तक मेरे प्रभु राम मुझे नही मिले थे... मेरा जीवन पिंजड़े में बेचारा बन्द पंछी उड़ने को बैचेन था...

_   मैं आत्मा रूपी सीता... देह के इस पिंजरे में कैद होकर उड़ना ही भूल गई थी... विकारों रूपी रावण ने मेरे पंख ही काट दिए थे... परन्तु *मेरे प्रभु राम, मेरे दिलाराम शिव ने आ कर... मुझे ना केवल रावण की कैद से छुड़ाया*... बल्कि ज्ञान और योग के पंख लगा कर मुझे उड़ना भी सिखाया... इस उड़ने में परम आनन्द समाया हुआ है... उसे मैं जब चाहूँ अनुभव कर सकती हूँ...

_   मैं आत्मा परमधाम में अव्यक्त स्थिति में स्थित हो... बिंदु बन... बिंदु शिव प्रीतम के साथ मिलन मना रही हूँ... *परमात्म लव में लीन... समा जाती हूँ... खो जाती हूँ...अतिन्द्रिय सुख के झूले में झूलती... मैं आत्मा एकदम हल्की होती जा रहीं हूँ*... शक्तियों से भरपूर अनुभव कर रही हूँ... मैं स्वयं में परमात्म शक्तियों की गहन अनुभूति कर रही हूँ...

_   *शिव साजन से बढ़ती यह मोहब्बत... मुझ आत्मा को उड़ती कला का अनुभव करा रहा है*... मैं आत्मा फरिश्ता बन उड़ती जा रही हूँ... मुझ आत्मा के पाँव जमीन पर नही हैं... यह फरिश्ता स्थिति मुझ आत्मा को बड़ी-बड़ी पहाड़ रूपी... परिस्थितियों को पार करने में... मेहनत से मुक्त करती जा रही है... सब सहज ही होता जा रहा है...

_   *चाहे कैसी भी परिस्थिति हो... उन्हें पार करने में मेहनत अनुभव नही होती*... बाप की मोहब्बत... बाप के स्नेह में लवलीन रहने से... मैं आत्मा स्वयं को बाप की छत्रछाया के अंदर अनुभव करती हूँ... बाप का स्नेह मेहनत को भी मोहब्बत में बदलता जा रहा है... *पहाड़ जैसी समस्या भी रुई समान अनुभव होने लगी है*...

_   स्नेह का सागर... प्यार का सागर मिल गया... और क्या चाहिए... सब कुछ मिल गया... उसके प्यार की मौज में झूमती मैं आत्मा स्वयं को सौभाग्यशाली अनुभव कर रही हूं.... मैं शिव साजन की महोब्बत की पात्र आत्मा बनती जा रही हूँ... वाह!!!मेरा साजन ओर वाह!!मैं शिव सजनिया... *स्नेह और मोहब्बत में डूबी मैं आत्मा... कभी भी किसी मेहनत को अनुभव नही कर सकती*...

 

∫∫ 8 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)
( इस रविवार की अव्यक्त मुरली पर आधारित... )

अव्यक्त बापदादा :-

_    तो ऐसे एवररेडी हो अर्थात् अनुभवी स्वरूप हो? साथ जाने के लिए तैयार हो ना या कहेंगे अभी अजुन यह रह गया है! ऐसी अनुभूति होती है वा सेवा में इतने बिजी हो गये हो जो घर ही भूल जाता है। सेवा भी इसीलिए करते हो कि आत्माओं को मुक्ति वा जीवनमुक्ति का वर्सा दिलावें। सेवा में भी यह स्मृति रहे कि बाप के साथ जाना है तो सेवा में सदा अचल स्थिति रह सकती है?  *सेवा के विस्तार में सार रूपी बीज की अनुभूति को भूलो मत। विस्तार में खो नहीं जाओ। विस्तार में आते स्वयं भी सार स्वरूप में स्थित रह और औरों को भी सार स्वरूप की अनुभूति कराओ। समझा -अच्छा।*

   *"ड्रिल :-  सेवा के विस्तार में सार रूपी बीज की अनुभूति करना”*

_   मैं आत्मा मन रूपी घोड़े में बैठकर रंग-बिरंगी दुनिया के आकर्षणों के विस्तार में दौड़ लगा रही थी... अपनी मंजिल को ढूंढते हुए न जाने कहाँ-कहाँ भटक रही थी... *अब परमपिता शिव बाबा ने आकर मंजिल तक पहुँचने का रास्ता बताकर भटकती हुई मेरे मन रूपी घोड़े की दिशा बदल दी...* अब मैं आत्मा मन रूपी घोड़े की लगाम को अपने हाथों में पकड़कर पहुँच जाती हूँ परमधाम...

_   *मैं आत्मा परमधाम में चमकते हुए ज्योतिबिंदु से निकलती हुई रंग-बिरंगी किरणों में खो जाती हूँ...* दुनियावी रंगों के मुकाबले बाबा से निकलती हुई किरणों का रंग कितना ही आकर्षणीय है... प्यारे बाबा से ज्ञान, गुण, शक्तियों की अलग-अलग रंगों की किरणें निकलकर मुझ आत्मा पर पड़ रही हैं... मैं आत्मा इन किरणों से भरपूर होकर सम्पन्न बन रही हूँ... सर्व खजानों की मालिक होने का अनुभव कर रही हूँ...

_   अब मैं आत्मा विश्व सेवाधारी की स्टेज पर स्थित हो जाती हूँ... मैं आत्मा महादानी बन बाबा से प्राप्त अविनाशी ज्ञान को सबमें बाँट रही हूँ... गुण, शक्तियों के खजानों को स्वयं के लिए और सम्बन्ध सम्पर्क में आने वालों के लिए समय प्रमाण यूज कर रही हूँ... *मैं आत्मा ज्ञान, योग, धारणा, सेवा चारों सब्जेक्ट्स में पास विद आनर होने का पुरुषार्थ कर एवररेडी बन रही हूँ...*   

_   मैं आत्मा भटकती हुई आत्माओं को बाबा का सन्देश देकर उनका भटकन समाप्त कर रही हूँ... *सबको राजयोग का गुह्य ज्ञान देकर सच्चा-सच्चा राजमार्ग बता रही हूँ...* जिस राजमार्ग पर चलकर राजाओं का भी राजा बनते हैं... मुक्ति वा जीवनमुक्ति का वर्सा पाते हैं... मैं आत्मा विश्व कल्याणकारी बन सेवा निःस्वार्थ सेवा कर रही हूँ...     

_   मैं आत्मा इसी स्मृति में रहकर सेवा करती हूँ कि बाबा के साथ वापस घर जाना है...  स्मृति स्वरुप बन औरों को भी सदा घर की स्मृति दिलाकर एवररेडी बनाने की सेवा कर रही हूँ... अब मैं आत्मा सदा अचल स्थिति में रहकर सेवा करती हूँ... सदा बाबा की और घर की याद में रहकर सेवा कर रही हूँ... मैं आत्मा सदा बीजरूप धारण कर बीजरूप बाबा की याद में ही रहती हूँ... *अब मैं आत्मा सेवा के विस्तार में आकर स्वयं भी सार स्वरूप में स्थित रहती हूँ और औरों को भी सार स्वरूप की अनुभूति कराती हूँ...*



_  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।


                                   ♔ ॐ शांति

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