✺ शिवभगवानुवाच :-
➳ _ ➳ रोज
रात को सोने से पहले बापदादा को पोतामेल सच्ची दिल का दे दिया तो धरमराजपुरी में
जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
∫∫
1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 3*5=15)
➢➢ *मोस्ट बिलवेड
बाप के साथ भोजन खाया ?*
➢➢ *एक बाप से ही
बुधी योग जोड़े रखा ?*
➢➢ *बुधी से बेहद की
पुरानी दुनिया को भूले ?*
∫∫
2 ∫∫ विशेष अभ्यास (Marks:2*10=20)
➢➢ *तूफानों को उडती
कला का तोहफा समझ अखंड सुख शांति संपन्न बनकर रहे ?*
➢➢ *"दुआएं
दो और दुआएं लो" - यह पुरुषार्थ कर सदा भरपूरता का अनुभव किया ?*
∫∫
3 ∫∫ विशेष पुरुषार्थ (Marks: 15)
( इस
रविवार की अव्यक्त मुरली से... )
➢➢ *"उड़ता
पंछी स्थिति का अनुभव किया ?*
∫∫
4 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)
( आज
की मुरली के सार पर आधारित... )
➢➢ *"मीठे बच्चे - इस समय इस भारत को श्रीमत
की दरकार है, श्रीमत
से ही कौड़ी जैसा भारत हीरे जैसा बनेगा, सबकी गति सदगति होगी"*
❉ *प्यारे बाबा :-* "मेरे मीठे फूल बच्चे...
श्रीमत को दिल की गहराइयो से अमल में लाकर जीवन को सुखो की बहार बना दो... *ईश्वर
पिता की श्रीमत ही पवित्रता के रंग में रंगकर देवताई ताज से सजाएगी.*.. श्रीमत की
ऊँगली पकड़ कर सहज ही सुखो के आँगन में पाँव रखेंगे... और भारत कौड़ी से हीरे जैसा
चमक उठेगा..."
➳ _ ➳ *मैं
आत्मा :-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मै आत्मा *श्रीमत के साये में खुबसूरत
प्यारे जीवन को जीती जा रही हूँ.*.. प्यारे बाबा आपकी छत्रछाया में कितनी सुखी और
निश्चिन्त हूँ... देह की मिटटी से बाहर निकल,खुबसूरत मणि बन दमक रही हूँ..."
❉ *मीठे बाबा :-* "मीठे प्यारे लाडले
बच्चे... रावण की मत और विकारी जीवन ने दुखो की तपिश से कितना जलाया है... अब राम
पिता की मत को थाम... फूलो के मखमल पर चलकर दुखो के छालो पर सदा का मरहम लगाओ..
*श्रीमत ही अथाह सुखो से भरा भाग्य दिलायेगी*... और असाधारण देवता बनाकर विश्व धरा
पर चमकाएगी..."
➳ _ ➳ *मैं
आत्मा :-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मैं आत्मा आपकी मीठी यादो में खोयी हुई
अपने मीठे भाग्य को देख पुलकित हूँ... *श्रीमत को पाकर श्रेष्ठ कर्मो से जीवन सुखो
का पर्याय बनाती जा रही हूँ.*.. प्यारे बाबा आपके प्यार के जादू में... मै आत्मा
कौड़ी से हीरा बन दमक उठी हूँ..."
❉ *प्यारे बाबा :-* "मेरे सिकीलधे
मीठे बच्चे... ईश्वर पिता को कभी दर दर खोज रहे थे... आज उसकी मखमली गोद में फूलो
सा खिल रहे हो... यह मीठी यादे, यह ईश्वरीय अमूल्य रत्न और श्रीमत 21 जनमो तक असीम
सुख प्रेम और शांति से जीवन खुशनुमा बनाएगी... *इसलिए सदा श्रीमत को बाहों में
भरकर खुशियो संग मुस्कराओ*...."
➳ _ ➳ *मैं
आत्मा :-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा श्रीमत के आँचल तले विकारो की
छाया से सुरक्षित हूँ... *प्यारे बाबा जीवन कितना धवल और प्रकाश से सराबोर हो चला
है.*.. आपकी यादो और अमूल्य ज्ञान रत्नों ने मेरा कायाकल्प किया है... और देवताई
सौंदर्य से मुझे सुसज्जित किया है..."
∫∫
5 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)
( आज
की मुरली की धारणा पर आधारित... )
✺ *"ड्रिल :- आज की
मुरली से बाबा की 4 निमनलिखित शिक्षाओं की धारणा के लिए विशेष योग अभ्यास*"
❶
*याद में भोजन खाना*
❷
*एक की श्रीमत पर चलना*
❸
*बुद्धि से पुरानी दुनिया को भूलना*
❹
*बेहद का सन्यास करना*
➳ _ ➳ आत्मिक
समृति में स्थित होकर अपने प्यारे मीठे शिव बाबा की याद में योग युक्त होकर में
भोजन बनाती हैं और भोग की थाली सामने रख अपने पिता परमात्मा शिव बाबा का आवाहन
करती हूं। मेरा आवाहन सुनते ही सेकंड में मेरे परम पिता परमात्मा शिव बाबा सूक्ष्म
वतन में पहुंच अपने आकारी रथ में विराजमान होकर मेरे सामने उपस्थित हो जाते हैं।
*बाबा बड़े प्यार से अपनी मीठी मीठी दृष्टि भोग की थाली पर और मुझ ब्राह्मण आत्मा
पर डालते हैं*। बाबा की शक्तिशाली दृष्टि पड़ते ही मेरा साकारी शरीर लुप्त हो कर
आकारी फरिश्ता स्वरूप में परिवर्तित हो जाता है।
➳ _ ➳ मेरे
हाथ में भोग की थाली है। बाबा मेरा हाथ पकड़ते हैं और मुझे ऊपर की ओर लेकर चल पड़ते
हैं। *सूक्ष्म वतन में मैं फरिश्ता अपने साथ भोग की थाली ले कर पहुँचता हूँ*। बाबा
मुझे इशारा करते हैं और मैं भोग की थाली वही रख बाबा के सामने बैठ जाता है। बाबा
से शक्तिशाली किरणे निकल कर मुझ फरिश्ते में और भोग में समाने लगती है।
➳ _ ➳ एकाएक
मैं देखता हूं कि बहुत सारी ब्राह्मण आत्माएं फ़रिश्ता स्वरुप में मेरे चारों ओर आ
कर बैठ जाती है और एक भोग की थाली से अनेक थालियां बन जाती हैं। बाबा बड़े प्यार
से भोग स्वीकार करते हैं और सभी ब्राह्मण बच्चों को भी भोग स्वीकार करने का इशारा
करते हैं। *मैं देख रहा हूँ सभी ब्राह्मण बच्चे बाबा की याद में बैठ ब्रह्मा भोजन
का आनन्द ले रहे हैं*। ब्रह्मा भोजन स्वीकार कर सभी ब्राह्मण बच्चे बाबा से विदाई
ले कर वापिस साकार लोक में आ जाते हैं। मैं
फ़रिश्ता भी वापिस साकारी दुनिया में लौट आता हूँ।
➳ _ ➳ साकारी
तन में विराजमान हो कर अब मैं आत्मा चिंतन करती हूँ कि *कितनी सौभाग्यशाली हूँ मैं
आत्मा जो भगवान के साथ भोजन खाने का श्रेष्ठ भाग्य मुझे प्राप्त हुआ है*। देवताओं
को भले 56
प्रकार के भोग खाने के लिए मिलेंगे किन्तु ब्रह्मा भोजन उनके भाग्य में भी नही
होगा। यही चिंतन करते करते मैं अपने प्यारे मीठे शिव बाबा से प्रतिज्ञा करती हूँ
कि सदा उनकी याद में रह उनके साथ भोजन खाऊँगी। *सदैव उनकी श्रीमत पर चलूँगी*। उनकी
श्रीमत में कभी भी मनमत वा परमत को अब मैं मिक्स नही होने दूंगी। बुद्धि का योग
निरन्तर उनसे ही जोड़ कर रखूंगी।
➳ _ ➳ देह
और देह की यह दुनिया और इससे जुड़े सभी सम्बन्ध केवल दुःख देने वाले हैं इसलिए *मन
बुद्धि से इस बेहद की पुरानी दुनिया से किनारा कर इसे भूलने का प्रयास मैं अवश्य
करुँगी*। स्वयं को ट्रस्टी समझ सब कुछ बाप हवाले कर इस बेहद की पुरानी दुनिया का
मन बुद्धि से बेहद का सन्यास करुँगी। प्रवृति में रहते हुए भी पर - वृति में
रहूँगी। बाबा को पूरा हिसाब दे, हर जिम्मेवारी हल्के रहकर निभाते हुए सब
चिंताओं से मुक्त रहूँगी। *कदम कदम बाबा से राय ले कर, बाबा के फरमान
पर चल बाबा की मदद की पात्र मैं अवश्य बनूँगी*।
➳ _ ➳ मन
ही मन बाबा से यह प्रतिज्ञा करते हुए मैं अनुभव करती हूँ जैसे बाबा का वरदानीमूर्त
हाथ मेरे सिर पर हैं और बाबा इस प्रतिज्ञा को पूरा करने का बल मुझ आत्मा में भर
रहें हैं। *मैं बाबा को दिल से शुक्रिया अदा करती हूँ और परमात्म बल से स्वयं को
भरपूर करने लगती हूँ*।
∫∫
6 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:-10)
( आज
की मुरली के वरदान पर आधारित... )
✺ *"ड्रिल :- मैं
आत्मा अखण्ड सुख-शान्ति से सम्पन्न हूँ ।"*
➳ _ ➳ हे
आत्मन, तुम
क्या सोच रही हो ?
क्या तुम जानते हो तुम्हारे जैसा भाग्यवान कोई नहीं है... ज़रा अपने दिव्य
चक्षु को खोलकर तो देखो... तुम्हारे भाग्य का सितारा, जीवन गगन में
चमक रहा है... *तुम स्वयं के भाग्य विधाता हो... स्वराज्य अधिकारी हो*... तुम्हें
तो स्वयं भगवान ने अपना बच्चा बनाया है... उसकी निहाल करने वाली नज़र तुम पर पड़ी
है... बाबा हम बच्चों को दिल से कह रहे, बच्चे तुम मेरे हो... और मैं तुम्हारा
हूँ... मैं आत्मा अपने भाग्य को देख मुस्कुरा रही हूँ... स्वयं भगवान मेरा हो गया
है...
➳ _ ➳ स्वयं
भाग्य विधाता परमात्मा मुझ आत्मा पर राज़ी हुआ है... बापदादा अपने हाथ फैलाए भाग्य
बाँट रहे हैं... बापदादा स्वयं मेरे द्वार पर मुझ आत्मा का सम्पूर्ण भाग्य बना रहे
हैं... मैं आत्मा सर्व शक्तिवान की छत्रछाया में हूँ... अर्थात *परमात्म प्राप्ति
के आधार पर अखण्ड सुख-शान्ति का अनुभव कर रही हूँ*... मुझ आत्मा पर अब वृक्षपति की
दशा बैठ गयी है... मैं आत्मा पदमा-पदम भाग्यशाली हूँ...
➳ _ ➳ मैं
आत्मा संगमयुग पर स्वयं भगवान के साथ पार्ट बजा रही हूँ... शिवबाबा के साथ और हाथ
से अब हर तूफ़ान भी अनुभवी बनाने वाली उड़ती कला का तोहफ़ा बन गया है... मैं आत्मा
उड़ती कला का अनुभव कर रही हूँ... *बापदादा के साथ और हाथ से कोई भी साधन, सैल्वेशन व
प्रशंसा अब मुझ आत्मा को सुख नही दे रही है*... मैं आत्मा एक बाबा के लव में लवलीन
होती जा रही हूँ... मैं आत्मा जन्म जन्म की सुख-शान्ति की अधिकारी हूँ...
➳ _ ➳ अब
बापदादा मुझ आत्मा को भाग्य की क़लम दे रहे हैं... और कह रहे हैं कि 'मीठे बच्चे'- अब तुम स्वयं
अपने कर्मों द्वारा अपना भाग्य लिखो...' *मैं आत्मा मन-बुद्धि-संस्कार द्वारा
सम्पूर्ण सुख-शान्ति की अधिकारी बन रही हूँ...* जिस भी गुण व शक्ति की ज़रूरत होती, तो सबसे पहले
दाता बन मैं आत्मा उसको शिवबाबा से लेकर देती जा रही हूँ... किसी भी प्रकार की अशान्त
करने वाली परिस्थितियाँ अब मुझ आत्मा की अखण्ड शान्ति को खण्डित नहीं कर सकती...
∫∫
7 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks-10)
( आज
की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )
✺ *"ड्रिल :- सर्व
को दुआये दे और दुआयें प्राप्त कर भरपूरता
का अनुभव"*
➳ _ ➳ मैं
चमकती हुई आत्मा स्वयं को अपने घर परमधाम में देखती हूँ... मैं अपने बीज रूप
सम्पूर्ण अवस्था में हूँ... सर्व गुणों से सम्पन्न मैं सतोप्रधान आत्मा... शिव
बाबा के सम्मुख हूँ... शिव बाबा सर्व गुणों का सागर हैं... मैं आत्मा मास्टर गुणों
का सागर हूँ... बाप समान हूँ... *एक बेदाग़ शुद्ध हीरे के समान मेरी रोशनी चहु ओर
फ़ैल रही हैं...*
➳ _ ➳ अब
मैं सतोप्रधान आत्मा... धीरे-धीरे नीचे आ रही हूँ... नीचे सूक्ष्म वतन में आकर मैं
अपने फ़रिश्ते की ड्रेस में बैठ जाती हूँ... मुझ फ़रिश्ते पर बापदादा की तेजश्वी
रोशनी पड़ रही है... बापदादा की दृष्टी से मुझ फ़रिश्ते में सभी शक्तियाँ भरती जा
रही हैं... बाबा मेरे सिर पर अपना वरदानी हाथ रखते है... और *अपनी सभी पॉवर्स मुझे
विल करते है...* बाबा से सर्व प्राप्तियों से भरपूर होकर... मैं फ़रिश्ता साकारी
दुनिया में आकर... अपने स्थूल शरीर में समा जाती हूँ...
➳ _ ➳ बाबा
से प्राप्त सभी खजाने मैं सर्व आत्माओं पर लुटाती हूँ... मेरे सम्बन्ध सम्पर्क में
आने वाली हर आत्मा मुझ से सुख और ख़ुशी की अनुभूति कर रही हैं... जो भी आत्मा मेरे
सम्पर्क में आती है उसके विघ्न विनाश हो रहे है... मैं विघ्न विनाशक आत्मा हूँ...
*बाबा से प्राप्त खजानों द्वारा सर्व की झोली भर रही हूँ...* बाबा का प्यार में
सर्व पर बरसा रही हूँ... मैं आत्मा सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाली सभी आत्माओं को
दुआओं से भरपूर करती हूँ... और सभी आत्मायें भी दिल से मुझे दुआयें दे रही है...
मैं सर्व की दुआयें प्राप्त करने की पात्र आत्मा बन गई हूँ...
➳ _ ➳ मैं
आत्मा सर्व की दुआयें प्राप्त कर सन्तुष्टमणि बन गई हूँ... मुझ से दुआये प्राप्त
कर सभी सन्तुष्ट हो रहे हैं...मैं सन्तुष्टमणि आत्मा हर व्यक्ति, हर परिस्थिति से
सन्तुष्ट हूँ... *मैं सम्पूर्ण और सम्पन्न आत्मा सदा सन्तुष्ट और प्रशन्न हूँ...*
मैं विश्व कल्याणकारी आत्मा हूँ... मेरे संकल्प, बोल, दृष्टी, वृत्ति, कृति सर्व का कल्याण ही करते है... और
मैं सदा सर्व की दुआयें प्राप्त कर उड़ती रहती हूँ...और अन्य आत्माओं को भी उड़ाती
रहती हूँ... हर पल सम्पन्नता और भरपुरता का अनुभव करती हूँ...
∫∫
8 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)
( इस
रविवार की अव्यक्त मुरली पर आधारित... )
✺ अव्यक्त बापदादा
:-
➳ _ ➳ ऐसी
समान आत्मा बन्धनमुक्त होने के कारण ऐसे अनुभव करेगी जैसे उड़ता पंछी बन ऊँचे से
ऊँचे उड़ते जा रहे हैं और ऊँची स्थिति रूपी स्थान पर स्थित होते अनुभव करेंगे कि यह
सब नीचे हैं। मैं सबसे ऊपर हूँ। जैसे विज्ञान की शक्ति द्वारा ‘स्पेस' में चले जाते
हैं तो धरनी का आकर्षण नीचे रह जाता है और वह स्वयं को सबसे ऊपर अनुभव करते और सदा
हल्का अनुभव करते हैं। *ऐसे साइलेन्स की
शक्ति द्वारा स्वयं को विकारों की आकर्षण, वा प्रकृति की आकर्षण सबसे परे उड़ती
हुई स्टेज अर्थात् सदा डबल लाइट रूप अनुभव करेंगे। उड़ने की अनुभूति सब आकर्षण से
परे ऊँची है। सर्व बन्धनों से मुक्त है। इस स्थिति की अनुभूति होना अर्थात् ऊँची
उड़ती कला वा उड़ती हुई स्थिति का अनुभव होना।* चलते-फिरते जा रहे हैं, उड़ रहे हैं, बाप भी बिन्दु, मैं भी बिन्दू, दोनों साथ-साथ
जा रहे हैं। समान आत्मा को यह अनुभव ऐसा स्पष्ट होगा जैसे कि देख रहे हैं। अनुभूति
के नेत्र द्वारा देखना, दिव्य दृष्टि द्वारा देखने से भी स्पष्ट है, समझा!
✺ *"ड्रिल :- उड़ता पंछी स्थिति का अनुभव करना”*
➳ _ ➳ *मैं
आत्मा पंछियों को दाना डालती हुई पेड़ पर बने हुए कबूतर के घोंसले को देखती हूँ...*
कबूतर एक-एक दाना अपने बच्चे के मुंह में डालती है... फिर उसको उड़ना सिखाती है...
उसका बच्चा पंख फडफडाता है थोडा ऊपर उड़ता है फिर डरकर वापस घोंसले में बैठ जाता
है... फिर एक दिन उड़ना सीख जाता है और घोंसले को छोड़ खुले आसमान में उड़ता रहता
है... मुझ आत्मा को उस कबूतर के बच्चे और मुझमें समानता नजर आई...
➳ _ ➳ *मैं
आत्मा पंछी भी इस दुनिया रूपी घोंसले में कब से बैठी हुई थी... मुझ आत्मा रूपी
पंछी के पंख कट गए थे...* जिसके कारण मैं आत्मा उड़ना नहीं जानती थी... इस घोंसले
को ही अपना घर समझ बैठी थी... और इस घोंसले को ही सजाने में लगी रही... मैं आत्मा
घोंसले की पंछी बनकर रह गई थी...
➳ _ ➳ *प्यारे
बाबा ने आकर मुझ आत्मा पंछी के मुंह में ज्ञान के दाने डालकर, योग की शक्तियों
के पंख लगाकर मुझ घोंसले की पंछी को उड़ना सिखा दिया...* मैं आत्मा ज्ञान-योग
द्वारा सर्व गुण-शक्तियों से संपन्न बन रही हूँ... मुझ आत्मा के मन की सारी हलचल
समाप्त हो रही है... मैं आत्मा साइलेंस का अनुभव कर रही हूँ... सभी विकारों, विकर्मों से
मुक्त हो रही हूँ... मैं आत्मा सर्व बन्धनों से मुक्त हो रही हूँ...
➳ _ ➳ मैं
आत्मा साइलेन्स की शक्ति द्वारा सर्व आकर्षणों से परे होकर ऊपर उड़ती जा रही हूँ...
अब मैं आत्मा डबल लाइट स्थिति का अनुभव कर रही हूँ... सभी बोझों से मुक्त होकर
सबसे हल्का अनुभव कर रही हूँ... धरनी का आकर्षण नीचे छोड़ मैं आत्मा स्वयं को सबसे
ऊपर अनुभव कर रही हूँ... *ऊपर उड़ने की अनुभूति से मैं आत्मा स्वतः और सहज ही माया
के सभी आकर्षणों से मुक्त हो रही हूँ...*
➳ _ ➳ मैं
आत्मा अब बाबा के ही संग-संग रहती हूँ... उनके ही साथ उठती हूँ... चलती हूँ...
खाती हूँ... पीती हूँ... सोती हूँ... हर कर्म सदा बाबा के साथ करते हुए बाप समान
स्थिति का अनुभव कर रही हूँ... अब मैं आत्मा सदा बाबा बिंदु के साथ बिंदु बन उडती
रहती हूँ... सदा ऊँची उड़ती कला का अनुभव करती रहती हूँ... अनुभूति के नेत्रों द्वारा
मैं आत्मा अपने को बाबा के साथ उड़ते हुए स्पष्ट देख रही हूँ... *अब मैं आत्मा
दुनिया रूपी घोंसले से आजाद होकर खुले आसमान में उड़ता पंछी होने का अनुभव कर रही
हूँ...*
⊙_⊙ आप
सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा
को आज की मुरली से मिले चार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।
♔ ॐ शांति ♔
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