08/05/17 की मुरली से चार्ट MARKS :- 100

 शिवभगवानुवाच :-
➳ _ ➳  रोज रात को सोने से पहले बापदादा को पोतामेल सच्ची दिल का दे दिया तो धरमराजपुरी में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

∫∫ 1 ∫∫ होमवर्क (Marks: 3*5=15) 
➢➢ *अशरीरी बनने का अब्यास किया ?*
 ➢➢ *"ड्रामा में होगा तो करेंगे" - ऐसा सोचकर पुरुषार्थ हीन तो नहीं बने ?* 
➢➢ *भाई - भाई की दृष्टि रही ?*



∫∫ 2 ∫∫ विशेष अभ्यास (Marks:2*10=20)

➢➢ *कल्याणकारी समय की स्मृति से अपने भविष्य को जान मास्टर त्रिकालदर्शी स्थिति का अनुभव किया ?*

➢➢ *सम्पूरण बनने का पुरुषार्थ कर समाप्ति के समय को समीप लाये ?*


∫∫ 3 ∫∫ विशेष पुरुषार्थ (Marks: 15)
( इस रविवार की अव्यक्त मुरली से... )

➢➢ *"शरीर से अलग मैं आत्मा हूँ" - ऐसा स्पष्ट अनुभव किया ?*

∫∫ 4 ∫∫ बाबा से रूहरिहान (Marks:-10)
( आज की मुरली के सार पर आधारित... )

➢➢  *"मीठे बच्चे - तुम ईश्वरीय फैमिली के हो, ईश्वरीय फैमिली का लॉ (नियम) है - भाई भाई हो रहना, ब्राह्मण कुल का लॉ है भाई बहन हो रहना इसलिए विकार की दृष्टि हो नही सकती"*

   *प्यारे बाबा :-* "मेरे मीठे फूल बच्चे... ईश्वरीय राहो में पवित्रता से सजधज कर देवताई श्रंगार को पाकर... *अनन्त सुखो के मालिक बन इस विश्व धरा पर मुस्कराओ.*.. ईश्वर पिता की सन्तान आपस में सब भाई भाई हो... इस भाव में गहरे डूबकर पावनता की छटा बिखेर... धरा पर स्वर्ग लाने में सहयोगी बन चलो..."

_   *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे प्यारे बाबा... मै आत्मा आपकी यादो में दिव्य गुणो की धारणा और *पवित्रता की ओढनी पहन कर निखर उठी हूँ.*..मै आत्मा विश्व धरा को पवित्र तरंगो से आच्छादित कर रही हूँ... शरीर के भान से परे होकर आत्मिक स्नेह की धारा बहा रही हूँ..."

   *मीठे बाबा :-* "मीठे प्यारे लाडले बच्चे... अपने खुबसूरत सत्य स्वरूप को स्म्रति में रखकर, सच्चे प्रेम की लहरियां पूरे विश्व की हवाओ में फेला दो... आत्मा भाई भाई और *ब्राह्मण भाई बहन के सुंदर नातो से पवित्रता की खुशबु चारो ओर फैलाओ.*.. विकारो से परे आत्मिक भावो से भरे सम्बन्धो से, विश्व को सजा दो..."

_   *मैं आत्मा :-* "मेरे प्राणप्रिय बाबा... मैं आत्मा देह के मटमैले पन से निकल अब आत्मिक भाव् से भर गयी हूँ... अपने अविनाशी सत्य स्वरूप को जान, विकारो को सहज ही त्याग चली हूँ... *सम्पूर्ण पवित्रता को अपनाकर पवित्र तरंगे बिखरने वाली सूर्य रश्मि* हो गयी हूँ..."

   *प्यारे बाबा :-* "मेरे सिकीलधे मीठे बच्चे...  अपनी दृष्टि व्रति और कृति को पावनता के रंग से सराबोर करो... दिव्यता और पवित्रता को विश्व धरा पर छ्लकाओ... विकारो की कालिमा से निकल खुबसूरत दिव्यता को बाँहों में भरकर मुस्कराओ... *आत्मिक सच्चे प्यार की सुगन्ध से विश्व धरा महकाओ*..."

_   *मैं आत्मा :-* "हाँ मेरे मीठे बाबा... मै आत्मा सबके मस्तक में आत्मा मणि को निहार रही हूँ... और सच्चा सम्मान देकर गुणो और शक्तियो से भरपूर हो रही हूँ... *मनसा वाचा कर्मणा पावनता से सजधज कर मै आत्मा* हर दिल पर यह दौलत लुटा रही हूँ...."


∫∫ 5 ∫∫ योग अभ्यास (Marks:-10)
( आज की मुरली की धारणा पर आधारित... )

   *"ड्रिल :- आज की मुरली से बाबा की 4 निमनलिखित शिक्षाओं की धारणा के लिए विशेष योग अभ्यास*"
             *देही अभिमानी बनना*
             *अशरीरी बनने का अभ्यास करना*
             *ड्रामा को यथार्थ समझना*
             *पुरुषार्थ हीन नही बनना*

_   बाबा के मधुर महावाक्य को समृति में ला कर *एकांत में बैठ मैं विचार सागर मंथन कर रही हूं और सोच रही हूं कि ड्रामा का कितना गुह्य राज बाबा ने स्पष्ट किया है*। जैसे ही ड्रामा शब्द को मैं अपने मन में दोहराती हूं। एक दृश्य आंखों के सामने आने लगता है।

_   मैं देखती हूं कि एक बहुत बड़ी स्टेज पर कोई शो चल रहा है। *डायरेक्टर, क्रिएटर, एक्टर सभी पर्दे के पीछे खड़े हैं। अपनी एक्ट करने के लिए सभी एक एक करके पर्दे के सामने आते हैं और बड़ी खूबसूरती के साथ अपने अभिनय का प्रदर्शन करते हैं*। दर्शक उन सबकी एक्ट को देख कर खुशी से तालियां बजा रहे हैं और उनके एक्ट की वाहवाही कर रहे हैं हैं। किंतु एक बहुत ही निराली बात *मैं देख रही हूं कि कोई भी एक्टर इस बात को नहीं देख रहा कि उसके एक्ट की वाहवाही हो रही है या लोग उसके एक्ट को देख उसे गालियां दे रहे हैं*। वह पूरी तन्मयता के साथ केवल अपने ही एक्ट में डूबा हुआ है। अपने अभिनय पर पूरा ध्यान केंद्रित कर उसे और अच्छे से अच्छा बनाने का प्रयास कर रहा है।

_   इस दृश्य को देखते देखते मैं खुद से ही बात करती हूं कि मैं भी तो एक एक्टर ही हूं जिसे इस विशाल सृष्टि रूपी रंगमंच पर केवल पार्ट प्ले करने के लिए भेजा गया है। फिर क्यों घड़ी-घड़ी मैं इस बात को भूल जाती हूं। *अगर मैं इस बात को सदा स्मृति में रखूं कि यहां सभी एक्टर हैं और केवल अपना पार्ट प्ले करने के लिए आएं हैं तो दूसरों की एक्ट को देख कर मेरे मन में उनके प्रति उठने वाले सारे भाव ही समाप्त हो जाएं*।

_   यही सोचते सोचते मैं गहराई से चिंतन करती हूँ कि क्यों मैं ड्रामा के इस गुह्य राज को घड़ी घड़ी भूल जाती हूँ। और अंतर्मन से जवाब मिलता है कि *मेरे वास्तविक स्वरूप की विस्मृति ही मुझे यह बात भुला कर प्रश्नों के घेरे में खड़ा करके मेरे जीवन को बार बार हलचल में ले आती हैं*। अब मैं खुद से प्रोमिस करती हूँ कि अब मुझे सदैव अपने वास्तविक स्वरूप की स्मृति में रहना है। देह अभिमान को छोड़ देही अभिमानी बनने का पुरुषार्थ मुझे अवश्य करना है। अशरीरी बनने का अभ्यास मेरे जीवन को बहुत ही सहज और सरल बना देगा।

_   स्वयं से यह प्रोमिस करते करते मैं अशरीरी स्थिति में स्थित हो जाती हूँ और अपनी साकारी देह को छोड़ पहुँच जाती हूँ निराकारी दुनिया में अपने निराकार शिव पिता परमात्मा के पास। *बिंदु बन बिंदु बाप के सम्मुख जाते ही बाबा की सर्वशक्तियाँ मुझ में समाने लगती हैं और मैं सर्वशक्तियों से भरपूर होने लगती हूँ*। कुछ देर तक इसी बीज रूप अवस्था में स्थित हो कर जब मैं भरपूर हो जाती हूँ तो लौट आती हूँ फिर से अपने साकारी तन में।

_   अशरीरी स्थिति का यह अनुभव अब मुझे साकारी देह में होते हुए भी अशरीरीपन का अहसास करवा रहा है। *मेरे सम्बन्ध सम्पर्क में आने वाले सभी सम्बन्धी मुझे आत्मा भाई के रूप में दिखाई दे रहें हैं*। हर एक आत्मा के पार्ट को अब मैं साक्षी हो कर देख रही हूँ। क्या, क्यों और कैसे के सभी प्रश्न अब समाप्त हो गए हैं। *ड्रामा को अब मैंने यथार्थ रीती जान लिया है। अब मेरा ध्यान केवल अपने पुरुषार्थ पर है।* "ड्रामा में होगा तो करेंगे" ऐसा कोई भी प्रश्न अब मुझे पुरुषार्थहीन नही बना सकता। इसी दृढ प्रतिज्ञा के साथ मैं कर्म करने के लिए वापिस चेतनता में लौट आती हूँ।


∫∫ 6 ∫∫ स्वमान का अभ्यास (Marks:-10)
( आज की मुरली के वरदान पर आधारित... )

   *"ड्रिल :- मैं आत्मा मास्टर त्रिकालदर्शी हूँ । "*

 _   देखे स्वयं को, और सिर से लेकर पैर तक अपने को ढीला छोड़ दे, और अपने मन को रिलैक्स कमांड दे... *मैं आत्मा रिलैक्स होती जा रही हूँ... देह का एक एक अंग रिलैक्स व शांत होता जा रहा है*... मुझ आत्मा का निज गुण है ही पवित्रता... जैसे ही मैं आत्मा अपने निजी गुण में टिकती हूँ, सुख-शान्ति से मेरा जीवन भरता जा रहा है... अब शिवबाबा, ब्रह्माबाबा के तन में आते है... शिवबाबा की याद से यह पल पूरा आनंदमयी हो गया है... बापदादा के रूहानी नैनों में मैं आत्मा खोती जा रही हूँ...

 _   बाबा को देखते ही मन में उठने वाले अनेक संकल्प अब मर्ज हो रहे है... जो भी संकल्प नेगेटिव या अनुचित लग रहे थे वह अब बाबा ने याद दिलाया की मीठे बच्चे, याद करो यह समय कौनसा चल रहा है ? *कल्याणकारी पुरुषोत्तम संगमयुग*... यदि अब मुझसे कोई पूछे कि आपका भविष्य क्या है ? तो मैं आत्मा निश्चिन्त होकर कह रही हूँ कि जो हो गया वो भी अच्छा, और जो हो रहा है वो भी अच्छा, कल जो होने वाला है वह बहुत अच्छा होगा...

 _   यह पुरुषोत्तम संगमयुग है ही कल्याणकारी युग... यहाँ हर अकल्याण कर्म में भी कल्याण समाया हुआ है... क्योंकि *स्वयं भगवान जिसको पूरी दुनिया ढूँढ रही है, वह मेरा साथी है... वही मुझे इस ड्रामा के हर एक राज़ को समझा रहे है*... कि कैसे हमने 63 जन्मों से जो विकर्म किए वही आज हमारे सामने आ रहे है... अब उन्हें योगबल से चूकतू करती जा रही हूँ... और भविष्य के लिए निश्चिन्त होती जा रही हूँ... यही एक समय है जब मैं आत्मा तीसरे नेत्र से अपना आज, कल और आने वाला कल देख रही हूँ...

 _   वाह कल्याणकारी ड्रामा वाह, यही गीत अब मन में बज रहा है... कितना सुंदर मुझ आत्मा ने कर्म किया होगा की स्वयं भगवान मुझे मिल गए और पढ़ा भी रहे है... और *मेरा आज इतना सुंदर और निश्चिन्त है तो आने वाला कल कैसा होगा ?? ... वाह ड्रामा वाह*... कितना अदभुत अनुभव है यह... बिलकुल इस दुनिया से पार... हल्की... लाइट माइट अवस्था... जो हो रहा है अच्छा हो रहा है... किसी की कोई ग़लती नही... सब ठीक है अपनी जगह... अपने संस्कार अनुसार... सब सही है... सब अपना रोल प्ले कर रहे हैं... है ही कल्याणकारी युग...

 _   अब मैं आत्मा मास्टर त्रिकालदर्शी की सीट पर बैठ गई हूँ... मुझे हर सीन सीनरी में निश्चय होता जा रहा है कि हर बात में कल्याण समाया हुआ है, यह कल्याणकारी समय चल रहा है... ड्रामा का हर एक सीन एक्यूरेट चल रहा है *बाप हमारा कल्याणकारी है और हम विश्व कल्याणकारी हैं तो हमारा अकल्याण हो ही नहीं सकता...*

∫∫ 7 ∫∫ रूहानी ड्रिल (Marks-10)
( आज की मुरली के स्लोगन पर आधारित... )

   *"ड्रिल :-  समाप्ति के समय को समीप लाने के लिए सम्पूर्ण बनने का पुरुषार्थ करने का अनुभव करना"*

_   मैं आत्मा प्रभु प्रेम की लग्न में मग्न बैठी हुई हूँ और बाबा से कह रही हूँ... जब से इस मन बुद्धि ने आपके प्रेम में डूबने का रस स्वाद ग्रहण किया है... कहीं भी भटकना चाहता ही नहीं... बस आपकी बातें सुनता रहे... समाता रहे और मानता रहे... *मैं बिन्दु स्वरूप आत्मा अपने बिन्दु स्वरूप बाबा के साथ जाने के लिए... सारे बिखरे हुए विस्तार को बिन्दु में समा रही हूँ...* बिन्दु बन बिन्दु में लवलीन हो रही हूँ... बाबा से सर्वगुणों की तथा सर्वशक्तियों की किरणें लेकर स्वयं में समाते हुये... सम्पन्न और सम्पूर्ण बनने का अनुभव कर रही हूँ...

_   देह और देहधारियों के लगाव में वास्तविक स्वरूप को भूल ही गई थी... दुःखों के दलदल में फंस गई थी... दुःखी होकर बाबा को पुकारा तो बाबा ने स्वयं मेरा हाथ पकड़ कर उस दलदल से निकाला... *बाबा ने मुझे मेरे वास्तविक स्वरूप की स्मृति दिलाकर... सृष्टिचक्र का तथा ड्रामा का ज्ञान देकर सदा का सुखी कर दिया...* श्रीमत पर चलकर मुझ आत्मा ने अपने जीवन को संवार लिया है...

_  इस पुरानी कलयुगी दुनिया में तो चारों तरफ विकारों की आग लगी हुई है... आत्मायें सुख शान्ति पाने के लिए तड़प रही हैं... प्रकृति भी तमोप्रधान है... अब यह दुनिया रहने लायक नहीं रह गई... बाबा का इशारा समझ रही हूँ... *कमलपुष्प समान न्यारे रहकर हर कर्म को कुशलता से करते जाना है...* समाप्ति के समय को समीप लाने के लिए पुरुषार्थ में तीव्रता लानी है...

_   मैं आत्मा अपने बाबा के साथ घर जाने की... आनंदमयी घड़ी के विषय में सोच कर ही आनंदविभोर हो उठी हूँ... अपना यह पुराना शरीर छोड़कर बाप के पास जाने की तैयारी बड़ी खुशी खुशी कर रही हूँ... *शिवबाबा सृष्टि चक्र के नाटक के अंतिम एपिसोड में स्वयं पास आकर समय की पहचान दे रहे हैं... पवित्र बनाकर वापस घर चलने की तैयारी करा रहे हैं...*

_   समाप्ति के समय को समीप लाने के लिए मुझ आत्मा ने भी अपना पुरुषार्थ तीव्र कर दिया है... बाबा की याद की छत्रछाया में स्वयं को सेफ रख कर एवररेडी बनने का पुरुषार्थ कर रही हूँ... कर्मातीत अवस्था को पाती जा रही हूँ... लास्ट के सेकेंड के पेपर में पास विद ऑनर होने के लिए... *अचल अडोल रह कर मैं एवररेडी आत्मा सम्पूर्णता की स्थिति का अनुभव कर रही हूँ...*


∫∫ 8 ∫∫ अव्यक्त मिलन (Marks:-10)
( इस रविवार की अव्यक्त मुरली पर आधारित... )

 अव्यक्त बापदादा :- 

 _   चलते फिरतेबैठतेबातचीत करते पहली अनुभूति- यह शरीर जो हिसाबकिताब के वृक्ष का मूल तना है जिससे यह शाखायें प्रकट होती हैंयह देह और आत्मा रूपी बीजदोनों ही बिल्कुल अलग हैं। ऐसे आत्मा न्यारेपन का चलते फिरते बार-बार अनुभव करेंगे। नालेज के हिसाब से नहीं कि आत्मा और शरीर अलग हैं। लेकिन शरीर से अलग मैं आत्मा हूँ! यह अलग वस्तु की अनुभूति हो। *जैसे स्थूल शरीर के वस्त्र और वस्त्र धारण करने वाला शरीर अलग अनुभव होता है ऐसे मुझ आत्मा का यह शरीर वस्त्र हैमैं वस्त्र धारण करने वाली आत्मा हूँ। ऐसा स्पष्ट अनुभव हो। जब चाहे इस देह भान रूपी वस्त्र को धारण करेंजब चाहे इस वस्त्र से न्यारे अर्थात् देहभान से न्यारे स्थिति में स्थित हो जायें। ऐसा न्यारेपन का अनुभव होता है?* वस्त्र को मैं धारण करता हूँ या वस्त्र मुझे धारण करता है?चैतन्य कौनमालिक कौनतो एक निशानी - ‘न्यारेपन की अनुभूति'। अलग होना नहीं है लेकिन मैं हूँ ही अलग।

   *"ड्रिल :-  'शरीर से अलग मैं आत्मा हूँ' - ऐसा स्पष्ट अनुभव करना*

 _   *मैं आत्मा एकांत में बैठकर व्यर्थ संकल्पों की बहती हुई बाढ़ से किनारा कर मन के अंतर्द्वार खोलकर अन्दर प्रवेश करती हूँ...* चारों ओर अँधेरा ही अँधेरा है... मैं आत्मा और अन्दर अंतर्मन की गहराईयों में प्रवेश करती हूँ... अंतर्मन के अँधेरे कमरे में एक बुझती-जगती हुई, टिमटिमाती हुई लाइट दिखाई दे रही है... इस लाइट के चारों ओर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, देह अभिमान, कई जन्मों के विकर्म और विकारों रूपी राक्षस इस दीपक के घृत को पी रहे थे...    

 _   मैं आत्मा इन राक्षसों से निपटने प्यारे बाबा को बुलाती हूँ... प्यारे बाबा तुरंत आ जाते हैं... बाबा का हाथ पकड़ मैं आत्मा अंतर्मन में प्रवेश करती हूँ... प्यारे बाबा के हाथों से शक्तिशाली किरणें निकल रही हैं... प्यारे बाबा की याद की शक्ति रूपी किरणों से इन सभी राक्षसों का खात्मा हो रहा है... *देह का भान, देह के बंधन, देह के पदार्थ,पुराने स्वभाव-संस्कार, सभी कमी-कमजोरियां भस्म होकर राख बन रही हैं... योग की तेज हवाएं इस राख को भी बाहर फेंक रही हैं...*

 _   अब मीठे बाबा इस दीपक में ज्ञान का घृत डालते हैं... *ज्ञान के घृत से टिमटिमाता हुआ दिया जगमगाता हुआ जलने लगता है...* अंतर्मन का कमरा चारों ओर से प्रकाशित हो रहा है... ये जगमगाता हुआ चैतन्य दीपक मैं आत्मा हूँ... अब मुझ आत्मा के अंतर्मन में कोई भी किचड़ा नहीं है... पूरा कमरा बिल्कुल साफ़ हो चुका है... ज्ञान, योग से प्रकाशित हो चुका है...    

 _   सर्व बंधनों से मुक्त मैं आत्मा इस देह की मालिक हूँ... इस देह रूपी वस्त्र को धारण कर मैं आत्मा सर्व कर्म कर रही हूँ... *इस विनाशी देह में रहकर अपना पार्ट बजाने वाली मैं अविनाशी आत्मा हूँ...* मैं तो एक अशरीरी आत्मा हूँ... इस शरीर को धारण कर कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म करती हूँ... ये मन, बुद्धि भी मुझ आत्मा के ही सूक्ष्म शक्तियां हैं... मैं आत्मा अज्ञानता वश इनके अधीन होकर दुखी हो गई थी... अब मैं आत्मा इनको अपने अधीन कर जैसा चाहे वैसा कर्म करा रही हूँ...

 _   अब मैं आत्मा स्पष्ट अनुभव कर रही हूँ कि मैं इस देह से बिल्कुल अलग हूँ... मैं आत्मा जब चाहे तब इस शरीर रूपी वस्त्र को धारण कर सकती हूँ... जब चाहे तब इस शरीर रूपी वस्त्र को छोडकर कहीं भी जा सकती हूँ... मैं आत्मा जब चाहे तब इस शरीर से डिटैच होकर न्यारेपन का अनुभव करती हूँ... *अब मैं आत्मा चलते-फिरते सदा इसी न्यारेपन की स्थिति में स्थित रहती हूँ कि मैं ये शरीर नहीं बल्कि देहरूपी वस्त्र धारण करने वाली चैतन्य आत्मा हूँ...*


_⊙  आप सभी बाबा के प्यारे प्यारे बच्चों से अनुरोध है की रात्रि में सोने से पहले बाबा को आज की मुरली से मिलेचार्ट के हर पॉइंट के मार्क्स ज़रूर दें ।

 ॐ शांति 


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